कुषाण वंश ( Kushan vansh ) के संस्थापक  और कुषाण वंश के बारे में महत्वपूर्ण बाते

कुषाण वंश की उत्पति , भारत पर इन्होने कैसे सासन कर लिया |

भारत में पार्थियाईओ के बाद कुषाण वंश  भारत में प्रवेश किया जो यूची और तोखरी भी कहलाते थे | यूची कबीला 5 किलो में बटा हुआ था  | कुषाण उन्हीं में से एक कुल के थे|

उत्तरी मध्य एशिया के हरित मैदानों के खानाबदोश लोग थे और चीन के पड़ोस में रहते थे |किसानों ने पहले बैक्ट्रिया और उत्तरी अफगानिस्तान पर कब्जा किया और वहां से सबको को भगाया धीरे-धीरे और वे काबुल घाटी की ओर बढ़े और हिंदूकुश पार करके गंधार पर कब्जा किया और वहां यूनानीयों और पर्थियइयो को अपदस्थ कर सता जमाई |

अंततः कुषाण वंश ने  निचली सिंधु घाटी तथा गंगा के मैदान के अधिकतर हिस्से पर भी अधिकार कर लिया उनका समराज आम उदारिया से गंगा तक मध्य एशिया के खुरासान से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक फैल गया |

कुषाणों ने पूर्व सोवियत गणराज्य में शामिल मद्धेशिया का अच्छा खासा भाग, ईरान का हिस्सा ,अफगानिस्तान का कुछ अंश लगभग पूरा पाकिस्तान और लगभग समूचा उत्तर भारत इन सारे विभागों को अपने शासन के साए में कर दिया |

इनमें नौ नौ प्रकार के लोगों और संस्कृतियों के आपस में घुल मिल जाने के विलक्षण अवसर आया और इन सम्मेलन की प्रक्रिया ने ऐसी संस्कृति को जन्म दिया जो आज के 9 देशों में फैली हुई है |

कुषाण वंश ( Kushan vansh ) के संस्थापक 

हम कुषाण के दो राजवंश पाते हैं जो एक के बाद एक आएं पहले राजवंश की स्थापना कैडसिस नामक सरदारों के घरानों ने की इस घराने का शासन 50 ईसवी से 28 वर्षों तक चला | इसमें दो राजा हुए पहला हुआ कैडसिस प्रथम जिसने हिंदू कुश के दक्षिण में सिक्के चलाए उसने रोमन सिक्कों की नकल करके तांबा के सिक्के ढलवाए |

दूसरा राजा हुआ| जिसने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं जारी की और अपना राज्य सिंधु नदी के पूर्व में फैला के बाद आया,  इस वंश के राजाओं ने उत्तरी भारत और निचली सिंधु घाटी में अपना प्रभुत्व फैलाया आरंभिक कुषाण राजाओं ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्रा जारी कि उनकी स्वर्ण मुद्रा धातु की शुद्धता में गुप्त शासकों की स्वर्ण मुद्राओं से कहीं अधिक थी |

उनकी स्वर्ण मुद्राएं तो मुख्यता सिंधु के पश्चिम में ही पाई गई है पर उनके अभिलेख ना केवल पश्चिम उत्तर भारत और सिंधु में ही बल्कि मथुरा, श्रवास्ती, कौशांबी, और वाराणसी तक दिखे मिले|

कुषाण वंश ( Kushan vansh ) की राजधानी

मैदानों में काफी भागों को भी अपने कब्जे में किया मथुरा में जो किसान के सिक्के अभिलेख संरचना और मूर्तियां मिली हैं उनसे प्रकट होता है कि मथुरा भारत में किसानों की वित्तीय राजधानी थी पहली राजधानी आधुनिक पाकिस्तान में अवस्थित पुरुष पुर, पेशावर में थी|

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कनिष्क का साम्राज्य

दूसरी शताब्दी (78 ईसा पूर्व से 44 ई.) में कुषाण वंंश के भारत का एक महान सम्राट था जिसका नाम कनिष्क  था । यह अपने राजनैतिक,सैन्य एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों तथा कौशल हेतु बिख्यात था ।

कनिष्क ने एक मठ और विशाल स्तूप का निर्माण कराया इस स्तूप को देखकर विदेशी यात्री चकित रह जाते थे, कुषाण ससक कनिष्क सर्वाधिक विख्यात  शासक था | लगता है कि उसने भारत की सीमाओं के बाहर चीनियों से हार खानी पड़ी लेकिन इतिहास में दो कारणों से उसका नाम है पहला उसने 78 ईसवी में एक शक सवंत  चलाया| और इसे  भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है |

दूसरा उसने बौद्ध धर्म का  मुक्त हिर्दय संपोषण किया | उसने कश्मीर में बौद्धों का सम्मेलन आयोजित किया जिसमें बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय को अंतिम रूप दिया गया | कनिष्क कला  और संस्कृत साहित्य का भी महान संरछ्क  था |कनिष्क के उतराधिकारी पचिमोतर भारत पर लगभग 230 ई तक राज करते रहे | उनमे से कुछ तो शुद्ध भारतीय नाम धारण कर लिया जैसे वासुदेव

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कुषाण वंश का पतन

ईरान में उठ खड़ी हुई सासनी शक्ति ईशा की तीसरी सदी के मध्य में अफगानिस्तान और सिंधु के पश्चिम क्षेत्र से छीन कर अपने कब्जे में कर लिए और भारत में कुषाण राजवाड़े लगभग 100 वर्षों तक रहे | लगता है कि कुषाण का अधिकार काबुल घटि, कपिशा और  बैक्ट्रिया में ईसा की तीसरी – चौथी सदी  में कायम रहा |

कुषाण वंश ( Kushan vansh )
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इनमें प्रशासनिक अभिलेखागार था जहां और आरमाइक लिपि और ख्वारिज्मी भाषा में लिखें पूरा लेख और दस्तावेज रखे हुए थे |

कुषाण वंश के बारे में महत्वपूर्ण बाते |

  •   भारत में  कुषाण वंश  की स्थापना कुजुल कडफिसेस ने 15 ई . में की ।
  • चीनी स्रोतों के अनुसार कुषाण चीन के पश्चिमोत्तर क्षेत्र के यू – ची कबीले के थे ।
  • कुजुल कडफिसेस ने काबुल और कश्मीर में हरमोयस को हराकर अपना राज्य स्थापित किया ।
  • कुजुल कडफिसेस ने केवल ताँबे के सिक्के चलवाये । कुजुल कडफिसेस के बाद विम कडफिसेस ( 65 ई . में ) राजा बना । विम कडफिसेस ने सोने एवं ताँबे के सिक्के जारी किये ।
  • यद्यपि उसके ताम्र तथा रजत ( चाँदी ) के सिक्के भी मिले हैं तथापि स्वर्ण सिक्के की संख्या अधिक है ।
  •  भारत में सर्वप्रथम यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किए , जिनकी मात्रा कुषाणों के शासन काल में बढ़ी ।
  • कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताँबा दोनों ही प्रकार के सिक्कों को प्रचलित किया था ।
  • विम कडफिसेस ने महाराज , राजाधिराज , महेश्वर एवं सर्वलोकेश्वर की उपाधि धारण की ।
  • कनिष्क की सबसे महत्वपूर्ण विजय चीन के यारकंद , खोतान तथा काशगर की विजय थी ।
  • विम कडफिसेस शैव धर्म को मानता था ।
  • कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक कनिष्क था ।
  •  कनिष्क 78 ई . में राजा बना तथा कनिष्क ने 78 ई . में शक संवत् शुरू किया था । • यही आजकल भारत का राष्ट्रीय पंचांग है ।
  •  कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर ( पेशावर ) थी ।
  • कनिष्क ने पाटलिपुत्र के शासक को हराकर , वहाँ से विद्वान अश्वघोष , बुद्ध का भिक्षापात्र एवं एक अनोखा मुर्गा साथ लाया ।
  • विम कडफिसेस के सिक्कों पर शिव , नन्दी एवं त्रिशूल की आकृति खुदी थी ।
  •  कनिष्क ने कश्मीर विजय के बाद वहाँ कनिष्कपुर नगर बसाया ।
  • कुषाण राजा देवपुत्र की उपाधि धारण की थी जिसे चीनियों से ली थी ।
  • बौद्ध धर्म का विश्वकोष ‘ विभाषाशास्त्र ‘ को कनिष्क को बौद्ध धर्म में अवश्घोष ने सिच्छा दी .
  • कनिष्क बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अनुयायी था ।
  • कनिष्क की द्वितीय राजधानी मथुरा में थी ।
  • चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान तथा महायान नामक शाखाओं में बँट गया ।
  • चौथी बौद्ध संगीति में ‘ विभाषाशास्त्र ‘ पुस्तक लिखी गई ।
  • कनिष्क के सिक्के यूनानी एवं ईरानी भाषा में थी ।
  • मथुरा से प्राप्त कनिष्क की मूर्ति सैनिक वेशभूषा में है ।
  • बुद्ध के अवशेषों पर कनिष्क ने पेशावर में एक स्तूप एवं मठ का निर्माण करवाया । कनिष्क के दरबार में महान दार्शनिक अश्वघोष रहता था ।
  • अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे ।
  • अश्वघोष ने बुद्धचरित् एवं सूत्रालंकार की रचना की ।
  • कुषाण शासक कनिष्क के समकालीन नागार्जुन , अश्वघोष एवं वसुमित्र थे ।
  •  इस समय कला की दो शैलियाँ ( 1 ) मथुरा शैली तथा ( 2 ) गांधार शैली प्रसिद्ध थीं ।
  • गांधार शैली में निर्मित बुद्ध तथा बोधिसत्व मूर्तियाँ ही विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।
  • मथुरा शैली में अनेक स्तूपों , विहारों तथा मूर्तियों का निर्माण किया गया है ।
  • प्रसिद्ध दार्शनिक एवं वैज्ञानिक तथा शून्यवाद का प्रतिपादक नागार्जुन कनिष्क के दरबार रहता था ।
  •  नागार्जुन ने ‘ माध्यमिक सूत्र ‘ ग्रंथ लिखा ।
  •  ‘ विभाषाशास्त्र ‘ की रचना वसुमित्र ने की ।
  •   कनिष्क का दरबारी चिकित्सक चरक था । चरक ने ‘ चरक संहिता ‘ लिखी थी ।
  •  कनिष्क का पुरोहित संघरक्ष था
  •  कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था ।
  • तक्षशिला में सिरकप नगर की स्थापना कनिष्क ने की । सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के कुषाणों ने चलाये ।
  •  कुषाण शासकों को देवपुत्र कहा जाता था ।
  •  कुषाण वंश  में मृत शासकों की मूर्तियों को मन्दिरों में रखा जाता था ।
  •  सेना में घुड़सवारी की दक्षता , सैनिक वेशभूषा एवं व्यूह रचना के क्षेत्र में कुषाणों ने भारत को नई जानकारियां दी ।
  •  मथुरा से कनिष्क की एक सिर रहित मूर्ति मिली है जिस पर ‘ महाराज राजाधिराजा देवपुत्रों कनिष्को ‘ अंकित है ।
  • अश्वघोष की रचनाओं की पाण्डुलिपियाँ  मध्य एशिया के तुरफान से मिली हैं ।
  •  चीन से व्यापार करने के लिये रोम को कुषाणों से मधुर संबंध बनाने पड़े । यह व्यापार महान रेशम मार्ग या सिल्क मार्ग से सम्पन्न होता था ।
  •  इससे कुषाणों को बहुत अधिक आय होती थी ।
  •  सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गांधार कला के अन्तर्गत हुआ है ।
  • पतंजलि ने मथुरा से सटका नामक वस्त्र पाये जाने का उल्लेख किया है ।
  • भारत में इथोपिया से हाथी दाँत एवं सोना आता था । तक्षशिला विभिन्न दिशाओं से आने वाले माल के संग्रह स्थल के रूप में प्रसिद्ध था ।

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दोस्तों उम्मीद करता हु की इस आर्टिकल में आप  कुषाण वंश ( Kushan vansh ) के बारे में  विस्तार से जाने होंगे | अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो तो आप हमें कमेंट जरुर करे : धन्य्वाद

 

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