गुप्त वंश | गुप्त काल की प्रमुख उपलब्धियां

गुप्त वंश का परिचय

इतिहासकारों ने गुप्त काल को भारतीय इतिहास का एक क्लासिकल युग कहां है | गुप्त वंश के राजाओं का शासन काल प्राचीन भारतीय इतिहास के सर्वाधिक गौरवशाली अध्याय का प्रतिनिधित्व करता है |

गुप्त सम्राट पूरे भारत को एक करने की भावना से प्रेरित थे. चौथी शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य उत्तर मध्य तथा दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था | यह घरेलू जीवन प्रशासन साहित्य और विज्ञान में पूर्णता का युग कहा जाता है |

यह अवधि कला ,वास्तु कला, विज्ञान, धर्म और दर्शन में अपनी उपलब्धियों के लिए प्रसिद्ध है | गुप्त काल समग्र रूप से समृद्धि का काल था जो अगली 200 वर्षों तक जारी रहा गुप्त काल को भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है |

गुप्त वंश का पहला शासक श्री गुप्त को माना जाता है. लेकिन इस काल के प्रथम महान शासक चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य का तेजी से विस्तार शुरू किया था | गुप्त काल को गौरवशाली बनाने का श्रेय मुख्य रूप से उस काल के कुछ महान शासकों को जाता है |

गुप्त वंश के प्रमुख शासक

चंद्रगुप्त प्रथम ( 319-330 )

चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का महान शासक था. जिस के मुख्य देन गुप्त संवत का प्रारंभ और प्रारंभिक राज्य विस्तार करना था | उसने महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की थी. उसने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह के जरिए अपने राज्य से सटे लौह अयस्क से समुद्र खानों का स्वामित्व प्राप्त किया|

यह अनुमान लगाया जाता है कि चंद्रगुप्त प्रथम के शासनकाल के अंत में गुप्त साम्राज्य की सीमा इलाहाबाद तक बढ़ गई थी | समुद्रगुप्त को अपना उतराधिकारी बनाने के बाद चन्द्रगुप्त ने सन्यास ग्रहण कर लिया |

समुद्रगुप्त ( 330-380 )

भारतीय इतिहास के पृष्ठों में राजनीतिक एवं सांस्कृतिक चेतना का एक महत्वपूर्ण अध्याय है. समुद्रगुप्त ने अपने पराक्रम से गुप्त साम्राज्य को एक क्षेत्रीय शक्ति से उठाकर भारत की सर्वाधिक शक्तिशाली सत्ता बना दी   |

प्रयाग प्रशस्ति, एरन स्तंभ लेख ,गया ताम्र फलक जैसे पुरातत्व साक्ष्य से समुद्रगुप्त के बारे में जानकारी मिलती है | प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को अचिंत्य पुरुष यानी विष्णु तक कहां गया है | उसे कुबेर, वरुण, यमराज तथा इंद्र की तुलना की गई है  |

उसने अपने विजय अभियान के तहत उत्तर भारत पर विजय प्राप्त करने के बाद समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के ओर अपनी निगाहें जमाई और दक्कन क्षेत्र में सैनिक कमान संभाल लिए   | उसने दक्षिणी अभियान के अंत तक दक्षिण के एक हिस्से को अपने साम्राज्य में मिला लिया  |

इसने विंध्य क्षेत्र की वन्य जनजातियों को अपने अधीन कर लिया था. ऐसा माना जाता है कि इस के समय में गुप्त साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कृष्णा और गोदावरी नदियों के मुहाने तक पश्चिम में बाल्ख अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैला हुआ था |

समुद्रगुप्त राजधर्म यानी एक राजा के कर्तव्यों के प्रति बहुत सचेत था | वह कौटिल्य के अर्थशास्त्र का बड़ी सटीकता से पालन करने पर भरोसा करता था  |  जिससे इसने राजशाही को नियंत्रित करने में भी कुशलता पाई. समुद्रगुप्त कई परोपकारी एवं सामाजिक कार्यों  के लिए दान देता था.

वह एक योग्य प्रशासक साहसी राजा होने के साथ-साथ एक कवि व संगीतकार भी था.  इसके द्वारा बड़ी संख्या में चलाए गए सोने के सिक्के उसकी बहुमुखी प्रतिभा को प्रदर्शित करते हैं |श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से गया में एक बौद्धमंदिर बनाने की अनुमति मांगी  |

समुद्रगुप्त विभिन्न समुदायों के बीच सद्भावना को बढ़ावा देने में विश्वास करता था  |  इसीलिए  विन्सेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा था   |

समुद्रगुप्त के बाद सत्ता के लिए संघर्ष हुआ सातवीं शताब्दी के संस्कृत लेखक बाणभट्ट द्वारा लिखित जीवनी हर्षचरित में समुद्रगुप्त के जेष्ठ पुत्र राम गुप्त को गुप्त वंश का अगला राजा बताया गया  | लेकिन उसकी मृत्यु के बाद चंद्रगुप्त द्वितीय को गुप्त वंश की गद्दी पर बैठाया गया  |

चंद्रगुप्त द्वितीय ( 380 – 415 )

समुद्रगुप्त एवं दत्त देवी का पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय असाधारण प्रतिभा अदम्य उत्साह विलक्षण के भारत के महान सम्राटों में से एक था | उसने सौराष्ट्र के क्षत्रप को हराकर अरब सागर को अपने राज्य में मिला लिया.  उसे साहसी कार्यों के लिए विक्रमादित्य की उपाधि से नवाजा गया  |

इतने अधिक समाज विस्तार के बाद इस विशाल साम्राज्य में और अधिक कुशलता से शासन करने के लिए चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी द्वितीय राजधानी उज्जैन में स्थापित की थी  | चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था |

इसी क्रम में उसने अपने नौसैनिक गतिविधियों को बढ़ाने पर ध्यान दिया | जिससे उसके समय में ताम्रलिप्ती और सुपारा बंदरगाह समुद्री व्यापार के व्यस्ततम केंद्र बन गए | चंद्रगुप्त विक्रमादित्य कला एवं संस्कृति के प्रेमी थे  | उन्होंने अपने दरबार की शोभा बनाने के लिए नौ अलग-अलग क्षेत्रों में पारंगत महा विद्वान और विभिन्न विषयों के जानकार व्यक्तियों को संरक्षण दिया था |

चंद्रगुप्त द्वितीय के के नौ रत्न

  • कालिदास
  • अमर सिंह
  • शंकु
  • धन्वन्तरी
  • चपानक
  • वेताल भट्ट
  • वररुचि
  • बारह मिहिर
  • घटाक्प्र्र

यह निपुण व्यक्ति विक्रमादित्य के नवरत्न कहलाते थे.

विभिन्न अनाथालय, धार्मिक संस्थाओं और अस्पतालों को दिया जाने वाला धन चंद्रगुप्त के उदारता को प्रदर्शित करता है| चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय गुप्त वंश अपने शिखर पर था.

जिसके अभूतपूर्व प्रगति ने जीवन के सभी क्षेत्रों को चिन्हित किया है| गुप्त वंश अपनी कला संस्कृति प्रशासन सामाजिक आर्थिक स्थितियों तथा विज्ञान के लिए प्राचीन भारत के इतिहास में एक अहम रोल अदा करता है |

गुप्त काल की प्रमुख उपलब्धियां

गुप्त वंश एक विशाल साम्राज्य बन चुका था. जहां प्रशासन के स्तर पर बेहतर रणनीतियां और दूरदर्शिता मौजूद थे | सम्राटों ने इस साम्राज्य का प्रशासन भी अत्यंत कुशलता के साथ संचालित किया, इस शासन का केंद्र सम्राट था|  जिसकी सहायता के लिए एक मंत्रिमंडल होता था जिसमें अमात्य, मंत्री एवं सचिव होते थे |

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इस साम्राज्य का प्रशासन प्रांतीय सत्ता पर आधारित था अर्थात यहां बड़े राज्यों को प्रांतों में विभाजित किया जाता था जिन्हें प्रदेश कहा जाता था| जिनमें प्रशासन के लिए प्रशासनिक प्रमुख नियुक्त किए गए थे | इन राजाओ द्वारा नौकरशाही में अनुशासन और पारदर्शिता बनाने पर खासा जोर दिया गया था |

इसके अतिरिक्त प्रांतों को जनपदों में विभाजित किया गया था जिन्हें विषय कहा जाता था और इनकी देखरेख के लिए नियुक्त प्रमुख को विषयपति कहा जाता था | इनके समय में लोग स्वतंत्र होकर बिचरण करते थे  |यहां चोरी की घटनाएं बहुत कम ही देखी जाती थी |

समुद्रगुप्त दक्षिण भारत के राज्यों को हासिल करने के बावजूद वहां के प्रशासन मूल राजाओं को सौंप कर वहां से केवल कर वसूलता था |

उसका मानना था कि देश का वह हिस्सा उसकी राजधानी से काफी दूर है जहां प्रशासन करने में कठिनाई होगी | उनके मानने वालों ने उन्हें एक विवेकशील राजा के रूप में स्वीकार किया है | किसी भी देश की राजनीति और प्रशासन वहां की सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों को भी प्रभावित करती है |

गुप्त काल की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियां क्या थी तथा वह कैसे वहां के साहित्य शिक्षा कला संस्कृति और विज्ञान को प्रभावित कर रही थी.

  • गुप्त काल में संस्कृति के विभिन्न अंगों का भी प्रचुरता से विकास हुआ है.
  • जिसमें सामाजिक आर्थिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है |
  • गुप्तकालीन सामाजिक व्यवस्था सबसे छोटी इकाई परिवार थी |
  • जहां संयुक्त तथा एकल दोनों परिवारों का प्रचलन था |
  • इस काल में समाज पितृसत्तात्मक था
  • . यानी परिवार का मुखिया पिता होता था
  • . समाज में वर्ण व्यवस्था पर्याप्त थी
  • . समाज में स्त्रियों की स्थिति संतोषजनक थी उन्हें सखी सचिव एवं प्रिय शिष्य कहा जाता था
  • इस काल में कृषि अत्यंत उन्नत स्थिति में थी इससे यह समझा जा सकता है की राजकीय भूमि से कर राजस्व का आय का प्रमुख स्रोत था
  • सिंचाई का प्रमुख स्रोत वर्षा ही थी किंतु तालाबों नहरों तथा कुआं से सभी सिंचाई की जाती थी
  • जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार स्कंद गुप्त के शासनकाल में सुदर्शन झील की मरम्मत कराई गई ताकि लोग सिंचाई के लिए उसका उपयोग कर सकें
  • लोग पशुओं के आर्थिक उपयोग से परिचित थे और उद्योग धंधे इस काल में विकास के लिए प्रोत्साहित किए जाते थे
  • लोग सादा जीवन बिताते थे वस्तुएं सस्ती थी और सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान दिया जाता था
  • सोने के सिक्कों को भारी मात्रा में जारी किया जाता था जो अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का संकेत है
  • इस समय देश में कपास, मसाले, दवाएं ,अनमोल रत्न, मोती ,कीमती धातु और स्टील समुद्र मार्ग द्वारा निर्यात किया जाते थे |
  •   खाद्य पदार्थ मसाले ,नमक तथा रत्न अंतर्देशीय व्यापार की प्रमुख वस्तुएं थी

हालांकि अर्थव्यवस्था के स्तर पर कुछ नकारात्मक संकेत भी मिलते हैं जैसे इस दौरान उत्तर भारत में नगरों का पतन हो रहा था स्वर्ण मुद्राएं मात्रा में तो ज्यादा थी लेकिन इनकी गुणवत्ता अपेक्षाकृत कम हो गई थी बहरहाल गुप्त साम्राज्य ना केवल सामाजिक आर्थिक प्रशासनिक बल्कि धार्मिक रूप से भी परिपक्व दौर था |

गुप्त राजा सभी धर्मों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने पर जोर देता था इसलिए स्वयं वैष्णव धर्म का होने के बावजूद उन्होंने जैन और बौद्ध को मानने वालों के प्रति सहिष्णुता अपनाई |उन्होंने कई बौद्ध मठों का दान दिया एवं बौद्ध भिक्षु तथा तीर्थ यात्रियों के लिए विश्राम गृह का निर्माण कराएं .ऐसा कहा जा सकता है कि ब्राह्मण धर्म का सर्वाधिक विकास गुप्त काल में हुआ |

सभी गुप्तकालीन सम्राट व्यक्तिगत रूप से वैष्णव धर्म के अनुयाई थे | राजकीय संरक्षण देकर उन्होंने इसे लोकप्रिय बना दिया था. इस काल के ब्राह्मण धर्म के मुख्य विशेषता थी कि यह यज्ञ के स्थान पर भक्ति और दान पर बल देते थे | मूर्ति पूजा का प्रचलन था. साथ ही यह धर्म अर्थ काम मोक्ष को अपना परम लक्ष्य मानते थे |

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इस काल में सेवा धर्म का भी सम्यक विकास देखा गया गुप्त राजाओं का काल ना केवल साम्राज्य विस्तार, सुशासन, आर्थिक संपन्नता एवं धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता है.

इस काल की ख्याति उच्च कोटि के साहित्य लेखन तथा अनुसंधान पूर्ण विज्ञान के लिए भी है. यह कहा जा सकता है कि साहित्य एवं विज्ञान की दृष्टि से गुप्त काल प्राचीन इतिहास के सर्वाधिक गौरवशाली इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है |

गुप्त काल के साहित्य रचनाकार की प्राप्त कृतियों से पता चलता है कि यह काल साहित्य के लिए कई महान कलाकारों का धनी था. कवि और नाटककार कालिदास ने अभिज्ञान शकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम् ,रघुवंश और कुमारसंभव जैसी रचनाएं की जो इस काल की साहित्य के लिए सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है |

विज्ञान ,गणित के क्षेत्र में .भी यह काल निपुण विभूतियों का धनी रहा है । वराह मिहिर ने बृहद संहिता लिखकर खगोल विज्ञान और ज्योतिष के क्षेत्रों में अपना योगदान दिया |

साथ ही इस काल के सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ और खगोल शास्त्र आर्यभट्ट ने सूर्य सिद्धांत लिखा जिसमें ज्यामिति, त्रिकोणमिति और परमाणु विज्ञान के कई पहलुओं को शामिल किया गया था | यह इस बात का परिचायक है कि इस काल में कोई भी पक्ष ऐसा नहीं था जो अपने विकास के से अछूता रहा|

गुप्त  काल में की गई खोजों ने आयुर्वेद की भारतीय और औषधीय प्रणाली को और अधिक कुशल बनाने में मदद की है. साथ ही धातुकर्म का विकास इस काल की प्रमुख वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक है| महरौली का लौह स्तंभ इसका प्रमुख उदाहरण है|

वह काल म्यूजिक, नृत्य ,संगीत और वाद्य यंत्रों में वीना सहित सात प्रकार के वाद्य यंत्र  शामिल हैं. जो इस काल में अपवाद के बजाय एक आदर्श कहे जा सकते हैं | इसके अतिरिक्त इस काल में जलयानो की चर्चा ,अजंता की गुफाओं का निर्माण, संरचनात्मक मंदिरों की बनावट और चित्रकारी से निरंतर विज्ञान और कला का विकास होता रहा  |

इस काल की चित्रकला मूर्ति कला और वास्तुकला के बेहतरीन उदाहरण अजंता, एलोरा ,सारनाथ ,मथुरा श्री गिरिया में देखे जा सकते हैं. इन सभी क्षेत्रों में बनी इस काल की कलाकृतियां विश्व परिदृश्य में भी अपने आदित्य स्थान रखते हैं | गुप्त वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण यहां के मंदिर है यहां के सर्वप्रथम संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ |

गुप्त वंश के मंदिरों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है |

 1  जिनमें गर्भ ग्रह एवं मंदिर का निर्माण होता है जैसे एरन और तिगवा का विष्णु मंदिर

2   जिनमें गर्भ ग्रह मंडल एवं ढका हुआ प्रदक्षिणा पथ होता है जैसे भूमरा का शिव मंदिर और नचना कुठार का पार्वती मंदिर

3  जिनमें गर्भगृह मंडल प्रदक्षिणा पत्र और शिखर होता था जैसे भीतरगांव मंदिर और देवगढ़ देवगढ़ का दशावतार मंदिर इसके अतिरिक्त कानपुर का भीतर गांव मंदिर से निर्मित इस मंदिर में विशाल शेखर गर्भ ग्रह वर्गाकार मंडप मिलता है | इसके शिखर में मेहराब लगाए गए हैं |

इसके अतिरिक्त रायपुर जिले से प्राप्त सिरपुर का ईंटों से बना लक्ष्मण मंदिर राजस्थान के कोटा से प्राप्त मंदिर सांची का मंदिर आदि भी उल्लेखनीय मंदिर है |

चित्रकला का समय विकास गुप्त वंश के युग में हुआ | वात्स्यायन चित्रकला की गणना 64 कलाओं में की है. उन्होंने चित्र के 6 अंगो का वर्णन किया है इस काल में चित्रकला सिखाने के लिए आचार्य नियुक्त किए जाते थे |

जिन्हें कालिदास ने चित्र आचार्य कहां है. औरंगाबाद के समीप स्थित अजंता के चित्र इस काल की चित्रकला का सर्वतो उदाहरण है | गुप्त काल  के उपयुक्त स्थान एवं इसे पराकाष्ठा पर पहुंचा देने वाला काल  रहा है |

गुप्त वंश के पतन के कारण

स्कंद गुप्त की मृत्यु तक गुप्त साम्राज्य अपनी समृद्धि के चरम स्तर पर था हालांकि स्कंद गुप्त के समय है बाह्य आक्रमण आरंभ होने लगे और अउन्नति का प्रारंभ हो गया था |

  •  इस काल के पतन के लिए सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक कारणों में गुप्त साम्राज्य के प्रवृत्ति शासकों का अयोग्य व निर्बल होना बताया जाता है |
  •  इतने बड़े साम्राज्य को चलाने में सक्षम ना हो सके
  •   गुप्त काल के शासन व्यवस्था में सामंतवादी विशेषताएं आ चुकी थी
  •  बाद में उन्होंने स्वतंत्र शासकों की भांति कार्य करना शुरू कर दिया था
  •  राजाओ को  विशेष अधिकारों के चलते यह गुप्त साम्राज्य की शक्तियों को विभाजित करते गए |
  • हूणों के आक्रमण
  • इतने बरे शेना को वेतन भोगी और रख रखाव में कमी करना |

 

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