चीनी क्रांति कब हुई थी

 चीनी क्रांति 1949 की पृष्ठभूमि ( Background )

– 16 वीं शताब्दी में पुर्तगालियों का चीन में प्रवेश , अन्य यूरोपीय देशों का प्रवेश , चीनी रेशमी वस्त्र , बर्तन , चाय आदि का व्यापार बढ़ा जिस वजह से यूरोपीय देशो का आकर्षण चीन की योर बढ़ा |

– 18 वीं सदी में ब्रिटेन द्वारा चीन को अफीम का निर्यात , चीन में अफीम की खपत बढ़ी

– चीनी मांचू राजवंश ने अफीम पर प्रतिबंध लगाया , चोर – छिपे व्यापार , ब्रिटेन को नुकसान , चीन ब्रिटेन युद्ध – अफीम युद्ध 1839-42

– चीन पराजित – नानकिंग की संधि – अनेक चीनी बन्दरगाहों पर ब्रिटेन का नियंत्रण एवं विशेष क्षेत्राधिकार – ब्रिटेन को लाभ – अन्य यूरोपीय देशों द्वारा चीन के साथ संधि

– ताइपिंग विद्रोह ( 1851-64 ) : यूरोपीय व्यापारियों / कंपनी द्वारा चीनी जनता पर मनमाना कर   मांचू वंश की उदासीनता – सियु – चुआन के नेतृत्व में जनविद्रोह ( ताइपिंग तिएन कुओ = स्थायी शांति का दैवीय साम्राज्य ) के स्थापना की घोषणा । मांचू वंश द्वारा दमन – असफल ।

बॉक्सर विद्रोह 1899 : यूरोपीय कंपनियों द्वारा शोषण , ईसाई धर्म का प्रसार , यूरोपीय देशों के ज्ञान विज्ञान एवं आदर्शों से परिचय – चीनी राष्ट्रवादी भावना का विकास । विदेशियों को भगाने के उद्देश्य से बॉक्सर समिति का गठन – 1901 में विदेशी सैनिकों की सहायता से दमन ।

– असंतोष बढ़ा – 1911 में मांचू राजतंत्र का अंत हो गया

    चीनी राष्ट्रवादी बनाम साम्यवादी दल

 

चीनी क्रांति कब हुई थी

– चीनी साम्यवादी दल की स्थापना 1921 में हुई थी । सन 1949 में चीनी साम्यवादी दल का चीन की सत्ता पर अधिकार करने की घटना चीनी साम्यवादी क्रांति कहलाती है ।

– चीन में 1946 से 1949 तक गृहयुद्ध की स्थिति थी । चीन में आधिकारिक तौर पर इस अवधि को ‘ मुक्ति संग्राम ‘ ( War of Liberation ) कहा जाता है ।

– चीन की पहली क्रांति का सूत्रपात डॉ सनयात सेन ने किया था । उन्हीं के प्रयत्नों से राष्ट्रवादी चीनी पार्टी की स्थापना हुई जिसे ‘ कुओमितंग ‘ के नाम से जाना जाता है ।

– 1911 में मांचू राजवंश का अंत कर गणतंत्र की स्थापना – अस्थायी राष्ट्रपति युवान शिह काई कुओमितांग ( राष्ट्रवादी चीनी पार्टी ) दल पर प्रतिबंध – सनयात सेन को जापान भागना पड़ा ।

– 1916 में युवान शिह काई की मृत्यु – प्रांतीय गवर्नर / सेनापतियों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया ।

– रूस में हुई साम्यवादी क्रांति से प्रभावित होकर 1923 में सनयात सेन ने रूसी साम्यवादी सरकार ।। से सहयोगात्मक संधि कर गणतांत्रिक सरकार बनाने का प्रयास किया किन्तु 1925 में उनकी मृत्यु के कारण यह पूरा नहीं हो पाया ।

– अंततः माओत्से तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी दल ने 1 अक्टूबर , 1949 को चीनी लोक गग ( पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ) की स्थापना की ।

 

    द्वित्तीय विश्वयुद्ध और चीन

– जापान का आक्रमण 1937 : चीन के मंचूरिया पर आक्रमण , पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप प्रारम्भ

– गृहयुद्ध : साम्यवादी एवं राष्ट्रवादी दल के मध्य संघर्ष , साम्यवादियों का पक्ष मजबूत , अमेरिका एवं ब्रिटेन का हस्तक्षेप , पूजीवादी देशों और च्यांग की सरकार के मध्य समझौता – पूंजीवादी देशों ने अपने विशेष क्षेत्राधिकार त्याग दिये ताकि चीन जापान का मुकाबला कर सके

. इसे भी पढ़े :  शीतयुद्ध का दौर ( Cold War 1945-90 )

– 1945 में अमेरिका द्वारा जापान पर पनमाणु बम गिरने के पश्चात द्वित्तीय विश्वयुद्ध का अंत – चीन में जापान के नियंत्रित क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रवादी एवं साम्यवादी दलों के मध्य संघर्ष

– अमेरिका की मार्शल योजना – जो दल जहां अपनी सत्ता स्थापित कर चुका है वह वहीं रहे ,

– साम्यवादियों का विरोध जारी और अंततः 1949 में च्यांग की सरकार को फारमोसा ( ताइवान ) 23 भागा दिया और साम्यवादी क्रांति सफल हुई ।

 

साम्यवादियों की सफलता के कारण

– कुओमितांग दल की अलोकप्रियता एवं भ्रष्ट शासन : उद्योगपतियों , बैंकरों व जमींदारों के हितों की रक्षा , भ्रष्टाचार

– सैन्य संगठन एवं सैन्य रणनीति की कमजोरियाँ : सैनिकों को समय पर वेतन नहीं मिलता था । सैनिकों की भर्ती और पदोन्नति योग्यता पर आधारित न होकर च्यांग भक्ति पर आधारित थी ।

– समाज के विभिन्न वर्गों में सामाजिक – आर्थिक असंतोष : किसानों की गरीबी दूर करने के उपाय नहीं , अमेरिका प्रभुत्व , विदेशी पूँजीपतियों द्वारा शोषण ,

– राष्ट्रवादी सरकार का साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ संबंध : अमेरिका के साथ संबंध था । चीनी अर्थव्यवस्था अमेरिकी आर्थिक साम्राज्यवादी नीति से परिचालित हो रही थी । चीन की बैकिंग 23 व्यवस्था पर अमेरिकी बैंक का नियंत्रण था ।

– च्यांग काई शेक की अदूरदर्शिता : च्यांग काई शेक ने जापानी आक्रमण के खतरे से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा साम्यवादियों को माना और साम्यवादियों के दमन का प्रयास किया ।

– चीनी साम्यवादियों की रणनीति एवं लोकप्रियता : किसान हितैषी नीतियाँ ( भूमि सुधार ) , कुशल एवं अनुशासित नेतृत्व ( माओत्से तुंग , चाउएन – लाई , लिन पियाओ आदि ) , गुरिल्ला युद्ध में साम्यवादीयों की दक्षता ।

 

    चीनी क्रांति के परिणाम / प्रभाव ( Effect )

– चीन में गृहयुद्ध की समाप्ति हुई । और 1 अक्टूबर , 1949 को साम्यवादियों द्वारा साम्यवादी लोकणराज्य की स्थापना हुई ।

–  एशिया महाद्वीप के विशाल क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की ।

– चीनी क्रांति कब हुई थी

– च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी सरकार को भाग कर फारमोसा ( ताइवान ) में शरण लेनी पड़ी और उसे अमेरिका का समर्थन मिला । इसी कारण चीनी – अमेरिकी संबंधों में तनाव की स्थिति बनी ।

– नए चीन की सबसे बड़ी प्राथमिकता अंतर्राष्ट्रीय जगत में मान्यता प्राप्त करने की थी । अमेरिका 6.1 इस बात के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा कि माओं के चीन को लगभग संक्रामक रोग से ग्रस्त अछूत की तरह रखा जाए , इसलिए संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में चीन की स्थाई सीट पर 23 फारमोसा ( ताइवान ) वाले च्यांग काई शेक को बरकरार रखा गया ।

– भारत सहित चीन के आसपास के देशों में माओवादी चिंतन को प्रोत्साहन मिला । समस्याओं के निराकरण हेतु बहुत सारे हिंसक माओवादी स्वरूप सामने आए ।

– साम्यवादियों ने तिब्बत पर कब्जा किया , फलतः भारत – चीन संबंधों में तनाव पैदा हुआ ।

– साम्यवादी खेमे की ताकत बढ़ी |

 

 

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