तारे

आज के इस आर्टिकल में जानेगे तारे९ stars ) के बारे में साथ ही इससे जूरी सभी महत्वपूर्ण जानकारियो के बारे में भी पढेगे :

 

तारे(stars ) – वे विशाल आकाशीय पिण्ड , जिनमें स्वयं अपना प्रकाश एवं ऊर्जा होती है , तारा( stars ) कहलाते हैं ।

आकाशगंगा में पाये जाने वाले कुल पदार्थों का 98 प्रतिशत भाग तारों में संचित है । आकाशगंगा में उपस्थित बादलों एवं धूलकणों द्वारा तारों का निर्माण होता है । . इनमें हाइड्रोजन एवं हीलियम की प्रधानता होती है ।

गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप गैसों एवं धूल – कणों के जमा होने एवं दबाव के कारण प्रोटो तारा ( Proto Star ) का निर्माण होता है । क्योकि दबाव के कारण ताप उत्पन्न होता है , जिसके फलस्वरूप नाभिकीय संलयन की क्रिया होती है एवं हाइड्रोजन हीलियम में परिवर्तित हो जाता है । इस प्रक्रिया में वृहत मात्रा में ताप एवं प्रकाश उत्पन्न होता है

इस प्रकार तारे का निर्माण होता है । लंबे समय तक नाभिकीय संलयन की क्रिया के फलस्वरूप हाइड्रोजन समाप्त होने लगता है और हीलियम क्रोड निरंतर बढ़ता जाता है । इस प्रक्रिया के फलस्वरूप तारे का बाहरी भाग फलने एवं लाल होने लगता है । ऐसे विशाल आकार वाले तारे को ही लाल दानव ( Red Giant ) कहा जाता है ।

 तारे

एक विशाल तारे ( stars) का अंत नोवा या सुपर नोवा अवस्था के रूप में होता है । जब तारों के कोर में स्थित ईंधन समाप्त होने लगता है , तब इनकी मृत्यु होने लगती है । – मृत होते हुए तारे में विस्फोट होता है , जिसके फलस्वरूप इनका चमकीलापन दस से बीस गुना बढ़ जाता है । – जब तारे का चमकीलापन ( Brightness ) बीस – गुना या इससे अधिक बढ़ जाता है , तब इसे सुपरनोवा कहा जाता है ।

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जब एक छोटा तारा ( ऐसा तारा जिसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के 1.2 गुना से अधिक न हो ) में नोवा या सुपर नोवा विस्फोट होता है तो विस्फोट के पश्चात् तारे का अत्यधिक सघन कोर का अवशिष्ट भाग व्हाइट ड्वार्फ ( White Dwarf ) कहलाता है । इसका आकार पृथ्वी के आकर से छोटा होता है परंतु केंद्रीय भाग का घनत्व 10 gm / cc तक होता है ।

धूमकेतु ( Comets ) ब्रह्माण्ड में आकाशीय धूल , गैसों एवं हिमकणों से निर्मित पिंड जो अनियमित कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करते हैं , धूमकेतु या पुच्छल तारे कहलाते हैं । सामान्यतः ये पूँछ रहित होते हैं , किन्तु जैसे ही वे सूर्य के निकट आते हैं , सूर्य की गर्मी के कारण इनकी बाहरी परत पिघलकर गैसों में परिवर्तित हो जाती है और चमकीली पूंछ के समान दिखाई देती है ।

सर्वाधिक प्रसिद्ध धूमकेतु हेली है जिसका आवर्तकाल 76 वर्ष है । 1994 में शूमेकर लेवी -9 वृहस्पति से टकराया था। टेंपल -1 , हेल बॉप एवं ऐंकी कुछ अन्य प्रमुख धूमकेतु उदाहरण हैं ।

 तारे

बड़े तारे ( सूर्य की आकार में दुगुनी आकार तक ) में नोवा या सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात् उसके सघन कोर का अवशिष्ट भाग न्यूट्रॉन तारा ( Neutron Star ) कहलाता है । न्यूट्रॉन तारा का घनत्व 10gm / cc तक होता है । छोटे आकार के कारण न्यूट्रॉन तारा काफी तीव्र गति से घूर्णन करता है एवं विद्युत चुम्बकीय तरंगों का उत्सर्जन करता है ।  ऐसे तारे पल्सर ( Pulsar ) कहलाते हैं ।

 

बड़े तारे विस्फोट के पश्चात् अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण काफी संकुचित एवं सघन हो जाते हैं । इनका घनत्व अत्यधिक ( 1016gm / cc ) होता है , अत्यधिक सघनता के कारण कोई भी पदार्थ यहाँ तक कि सूर्य का प्रकाश भी , इसके गुरुत्वाकर्षण से नहीं बच पाता है तथा अंधक्षेत्र हो जाता है । यही कारण है कि इसे कृष्ण छिद्र ( Black Hole ) कहा जाता है । वर्ष 1967 में सर्वप्रथम ब्लैक होल शब्द का प्रयोग अमेरिका के भौतिक शास्त्री जॉन व्हीलर ने किया था ।

उल्का एवं उल्का पिंड ( Meteors and Meteorites ) | ब्रह्माण्ड में उल्का धूल एवं गैस से निर्मित लघु पिंड है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी की ओर आते हैं और वायुमंडलीय घर्षण के कारण जल कर नष्ट हो जाते हैं । जो पिंड पूर्णत : नष्ट नहीं होते , चट्टानों के रूप में पृथ्वी पर गिरते हैं । इन्हें उल्काश्म | ( Shooting Stars ) कहते हैं । बड़े उल्काश्मों को उल्का पिंड कहते हैं ।

 

 

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