तीन तलाक क्या है | भारत में इसका असर क्या हुआ

तीन तलाक  क्या है ? ( what is triple talaq )

भारत में वर्षों से  तीन तलाक़ ( ट्रिपल तलाक़ ) यानी तलाक ए बिद्दत की कुप्रथा से मुस्लिम महिलाएं पीड़ित रहीं हैं। लेकिन एक लंबे संघर्ष के बाद आख़िरकार मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ मिल ही गया। साल 1970 और 1980 के दशक में शाहबानो ने इसके खिलाफ एक लंबा संघर्ष किया।

1985 में संसद में शाह बानो के केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया था। पर मोदी सरकार ने उस भूल को सुधारा ..इसी के साथ भारत एक नए युग में प्रवेश कर गया।

जिसमें मुस्लिम महिलाएं अब इस ज्यादती से आज़ाद हो गई हैं… ये कहीं ना कहीं सच्चाई की जीत और वोट बैंक की राजनीति की हार है। इसी के साथ मोदी सरकार ने चुनावों के द्वारान किए गए अपने सबसे प्रमुख वादे को पूरा किया।

लोकसभा के बाद मंगलवार को राज्य सभा से भी मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक पास हो गया। और शाह बानो से लेकर सायरा बानो के सफर को मंज़िल मिल ही गई। देश भर में हज़ारों मुस्लिम महिलाओं ने मिठाइयां बांटकर अपनी ख़ुशी का इज़हार किया।

अब ये विधेयक क़ानूनी शक्ल ले लेगा.. और किसी भी रूप में ट्रिपल तलाक़ देने पर दोषी व्यक्ति को दंडित किया जाएगा।

मुस्लिम महिलाओं के अधिकार को लेकर 30 जुलाई का दिन बेहद खास बन गया संसद ने मुस्लिम महिलाओं को एक बार में तीन तलाक देने की प्रथा पर रोक लगाने के प्रावधान वाले ऐतिहासिक विधेयक को मंजूरी दे दी |

विधेयक में एक बार में तीन तलाक को अपराध माना गया है ऐसा करने पर संबंधित पति को 3 साल तक की जेल देने का प्रावधान किया गया है मुस्लिम विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2019 को राज्यसभा ने 84 के मुकाबले 99 मतों से पारित कर दिया लोकसभा से यह विधेयक 25 जुलाई को पारित हुआ था |

इससे पहले उच्च सदन में यह विधेयक को प्रवर समिति में भेजने के विपक्ष की सदस्यों की ओर से लाए गए प्रस्ताव को 84 के मुकाबले 100 मतों से खारिज कर दिया गया | विधेयक पारित होने से पहले ही जेडीयू के सदस्यों ने विरोध जताते हुए सदन से वाकआउट किया विधेयक पर हुई |

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के शब्दों में तीन तलाक

चर्चा के जवाब देते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि तीन तलाक से प्रभावित होने वाली करीब 75% महिलाएं गरीब वर्ग की होती है | ऐसे में यह विधेयक उन को ध्यान में रखकर बनाया गया है उन्होंने कहा कि कानून के बिना पुलिस पीड़ित महिलाओं की शिकायत सुनने के लिए तैयार नहीं थी |

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कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अगर मंशा साफ हो तो लोग बदलाव की पहल को समर्थन करने को तैयार रहते हैं उन्होंने कहा की इस्लामिक देश भी महिलाओं के लिए बदलाव की कोशिश कर रहे हैं तो लोकतांत्रिक देश होने के नाते तो हमें क्यों नहीं करना चाहिए|

तीन तलाक के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था | इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को मुस्लिम विवाह और तलाक संबंधी व्यवस्था के लिए कानून बनाने के निर्देश भी दिए थे |

तीन तलाक क्या है
                                                 sourses : rajya sabha tv

तीन तलाक से जुड़े विधेयक को संसद से पारित होने में लंबा वक्त लगा 3 अध्यादेश और तीन बार विधायक लाने के बाद भी संसद से मंजूरी मिल सके |

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सबसे पहले 28 दिसंबर 2017 को सरकार ने लोकसभा में विधेयक पेश किया | हालांकि लोकसभा से पारित होने के बाद यह विधेयक राज्यसभा में अटका रहा |

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19 सितंबर 2018 को सरकार अध्यादेश लाई 17 दिसंबर 2018 को नए सिरे से लोकसभा में यह विधेयक लाया गया राज्यसभा में लंबित रहने पर सरकार 12 जनवरी 2019 दूसरी बार अध्यादेश लाई 3 फरवरी 2019 को तीसरी बार अध्यादेश लाई गई तीसरी बार सरकार ने 21 जून 2019 को लोकसभा में नए सिरे से विधेयक पेश किया |

25 जुलाई को लोकसभा से यह विधेयक की मंजूरी मिल गई और आखिरकार 30 जुलाई को राज्यसभा से भी या विधेयक पारित हो गया |

तीन तलाक क्या है ( what is triple talaq )

लंबे समय के बाद मुस्लिम महिलाओं को एक बार में तीन तलाक से छुटकारा मिल गया ,तलाक के विदत यानी एक बार में तीन तलाक देना अब गैरकानूनी होगा, मुस्लिम महिला विवाह संरक्षण अधिनियम विधायक में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को मौखिक लिखित या किसी अन्य विधि से तीन तलाक देता है तो ऐसी कोई भी उद्घोषणा अवैध मानी जाएगी |

तीन तलाक संघीय अपराध बनाया गया है यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है लेकिन महिला खुद शिकायत करेगी तब खून या  शादी के रिश्ते वाले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार होगा |

आरोपी पति को 3 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है लेकिन मजिस्ट्रेट पति को जमानत दे सकता है आरोपी को जमानत तभी मिलेगी जब पीड़ित महिला का पक्ष सुना जाएगा |

विधायइका  में विवाहित मुस्लिम महिलाओं के संरक्षण का भी प्रावधान किया गया है पीड़ित महिला के लिए गुजारे भत्ते की व्यवस्था की गई है तीन तलाक से पीड़ित महिला अपने पति से खुद या अपनी संतान के लिए निर्वाह भत्था हासिल करने की हकदार होगी । इस रकम को मजिस्ट्रेट निर्धारित करेगा |

अगर तीन तलाक देने वाला समझौता करना चाहता है तो पहले इसके लिए पीड़ित महिला के रजामंदी की जरूरत होगी

पीड़ित महिला नाबालिक बच्चे को अपने पास रखने की हकदार होगी|

संविधान मूल्यों की स्थापना के हिसाब से विधेयक के प्रावधान बेहद महत्वपूर्ण है इससे मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक बराबरी का अधिकार मिल सकेगा और उनके मौलिक अधिकार का संरक्षण हो सकेगा .

 तीन तलाक  बिल के इतिहास

शाहबानो से लेकर सायरा बानो तक तीन तलाक के खिलाफ दोनों की आवाज भारत के मुस्लिम महिलाओं की आवाज बने 34 साल में दो मौके ऐसे आए जब तीन तलाक का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक फैसले भी सुनाएं |

1985 में तीन तलाक के खिलाफ सबसे पहले आवाज बुलंद करने वाली मुस्लिम महिला थी, शाहबानो जिन के हक में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था| लेकिन तब की सरकार ने संसद में कानून बनाकर फैसले को पलट दिया था,

लेकिन जब दूसरी बार 2016 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा सायरा बानो ने खटखटाया तो हक में फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया और इस बार सरकार ने भी कानून बनाकर तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया |

1981 में सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक से जुड़ा पहला मामला आया मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो का इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को 1978 में उनके पति मोहम्मद अहमद ने 62 साल की उम्र में तलाक दे दिया और घर से निकाल दिया | शाहबानो उस समय 5 बच्चे की मां थी इन बच्चों की गुजारो के लिए वह पति पर निर्भर थी |

मजबूरन शाहबानो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा सीआरपीसी की धारा 125 का फैसला दिया जो तलाक के केस में गुजारा भत्ता तय करने से जुड़ी है |

2016 में सायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक के खिलाफ केस दर्ज किया तीन तलाक के खिलाफ सायरा बानो के पिटिशन के साथी कोर्ट ने ऐसे बाकी मामलों को भी अटैच कर दिया |

22 अगस्त 2017 को सबसे जटिल सामाजिक मुद्दों में से एक तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुनाया पांच में से तीन जजों ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया |

तीनों जजों ने संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करार दिया जजों ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक महिलाओं के मूलभूत अधिकार का हनन करता है|

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