दांडी मार्च की कहानी  बिस्तार से

दांडी मार्च की कहानी 

अंग्रेजों के नमक कानून के खिलाफ महात्मा गांधी जी द्वारा शुरू किया गया दांडी मार्च युगांतकारी घटना है ,जिसने न केवल ब्रिटिश हुकूमत की न्यू हिला दि ‘ बल्कि आजादी के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई  |’

नमक सत्याग्रह के जरिए महात्मा गांधी ने न केवल ब्रिटिश कानून को चुनौती दी, बल्कि भारतीय जनमानस में यह विश्वास पैदा कर दिया की आजादी की राह में सत्य का प्रयोग करते हुए हर उस काले कानून का विरोध कर सकते हैं. जो उन्हें उनके अधिकार हासिल करने से रोकते हैं या वंचित करते हैं .दुनिया में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जितने भी आंदोलन हुए उनमें दांडी मार्च अपने आप में एक अनोखा है |

महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक और सिविल नाफरमानी का यह आंदोलन भारत से अंग्रेजों के सत्ता को उखाड़ फेंकने में सबसे मजबूत हथियार साबित हुआ |

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की खासियत यह है कि इसका आधार कोई गुण ,दार्शनिक ,ज्ञान नहीं था बल्कि यह बहुत साधारण लेकिन जमीन से जुड़ा हुआ था जो सत्य और अहिंसा पर टिका था |  लेकिन नमक जैसी रोजमर्रा की चीज भी इस आंदोलन में प्रतिरोध की सूचक बनी और प्रतिरोध की शक्ति थी सत्याग्रह जिसे नाम मिला नमक सत्याग्रह ‘,

12 मार्च 1930 को अंग्रेजों के नमक कानून के खिलाफ गांधी जी ने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा की शुरुआत की थी  दांडी  मार्च  का दमन करने के लिए अंग्रेजों ने पूरी ताकत का प्रयोग किया | कई सत्याग्रही घायल भी हुए लेकिन सत्य की ताकत ने पूरे अंग्रेजी शासकों को हिला कर रख दिया ।

गुलामी के दिनों में जब देश आजादी के लिए हूनकारे मार रहा था तब हर भारतीय का दिल गोरी हुकूमत के खिलाफ नफरत और गुस्सा से भरा हुआ था । नफरत भी ऐसी थी जो कभी भी एक आंदोलन का रूप ले सकती थी ।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय और सर्वमान्य नेता थे लेकिन असहयोग आंदोलन खत्म होने के बाद से उन्होंने अपना पूरा ध्यान समाज सुधार कामों में लगा रखा था एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर हो गए थे | लेकिन जब वह अंग्रेजों के छुपे हुए नमक कर के खिलाफ सक्रिय हुए तब उन्होंने न केवल ब्रिटिश सरकार की बल्कि पूरी दुनिया की आत्मा को झकझोर दिया |

ब्रिटिश सरकार ने उस समय किसी भी भारतीयों को नमक बनाने या नमक इकट्ठा करने या बेचने पर रोक लगा रखी थी | नमक बनाने पर ब्रिटिश सरकार का एक अधिकार था जो कि भारतीयों को नमक अंग्रेजों से खरीदना पड़ता था और बिना टैक्स दिए किसी को भी नमक नहीं मिलता था | हालांकि उस वक्त नमक के अलावा चाय कपड़ा आदि पर भी ब्रिटिश हुकूमत का एकाधिकार था | लेकिन महात्मा गांधी का मानना था की नमक पर हर भारतीय का हक है |

भारत के लोग काम करते हुए पसीना बहा रहे हैं और उन्हें ही नमक नहीं मिल पा रहा है गाँधी जी की नजर में यह अन्याय था महात्मा गांधी का यह भी मानना था कि नमक प्राकृतिक चीज है और मुफ्त में मिलता है | उन्होंने कहा था कि देश के लोग अपने पसीने में नमक बहा रहे हैं और नमक पर पहला अधिकार उन लोगों का ही है |

अंग्रेजों के इस काले कानून को तोड़ने के लिए महात्मा गांधी ने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से नवसारी जिले से दांडी तक मार्च करने और समुद्र से नमक बनाने का फैसला किया गांधी जी का यह मार्च सत्य के लिए था उस काले कानून के खिलाफ था जिसे लगाकर अंग्रेजों ने भारतीयों से उनका हक छीन रखा था |

12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने नमक कानून के खिलाफ दांडी मार्च यानी दांडी यात्रा की शुरुआत की इसे नमक सत्याग्रह भी कहा जाता है गांधी जी ने अपने 78 सहयोगियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक पैदल ही यात्रा की 349 किलोमीटर लंबे इस रास्ते को पूरा करने में उन्हें 24 दिन लग गए जैसे जैसे ही है| यात्रा अहमदाबाद से दांडी की तरफ बढ़ी वैसे वैसे लोग इससे जुड़ते गए दांडी पहुंचने तक इस अहिंसक नमक सत्याग्रह में हजारों लोग जुड़ चुके थे इस मार्च में गांधी जी के साथ आने वालों में सभी वर्ग और जाति के लोग शामिल थे |

अरब सागर के तटीय इलाका पर बसा दांडी ऐतिहासिक पलों का वाह बनने वाला था |

 महात्मा गाँधी के द्वारा दांडी मार्च
नमक बनाते हुए लोग

गांधी जी के नमक आंदोलन के प्रभाव को देखते हुए अंग्रेजों ने समुद्र किनारे पड़े नमक को कीचड़ में फैला दिया था लेकिन गांधीजी तो गांधी थे उन्होंने उसी कीचड़ से सने नमक से अंग्रेजों को सबक सिखाया 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने समुद्र तट से एक मुट्ठी नमक उठाकर अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ दिया इस मुट्ठी भर नमक से गांधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत को जितना सशक्त संदेश दिया इतना मजबूत संदेश शायद शब्दों से नहीं दिया जा सकता था | हालांकि नमक कानून भंग करने के बाद अंग्रेज सिपाहियों ने सत्याग्रह यू पर लाठी-डंडे भी बरसाए लेकिन उन देशभक्तों ने नहीं पलटकर वार किए ना ही वहां से पीछे हटे ब्रिटिश सरकार के लिए यह बहुत बड़ा झटका था गांधी जी की इस साहसी कदम की चर्चा और प्रशंसा पूरी दुनिया में होने लगी |

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गांधी जी को 5 मई 1930 को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन इससे पहले वे नमक कानून तोड़कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक लहर पैदा कर चुके थे उस समय अमेरिका की मशहूर पत्रिका टाइम ने 31 मार्च 1930 के अंक में गांधी जी की तस्वीर छापी थी |

यही नहीं साल 2011 में टाइम पत्रिका ने महात्मा गांधी के दांडी मार्च को दुनिया को बदल देने वाले 10 महत्वपूर्ण आंदोलनों के सूची में दूसरे स्थान पर रखा|  नमक सत्याग्रह ने पूरे देश में अंग्रेजो के खिलाफ व्यापक जन संघर्ष को जन्म दे दिया | इसके लिए एक चिंगारी भड़की जो आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन में तब्दील हो गई |

दांडी मार्च पर लेख

91 साल पहले यानी आज 12 मार्च 1930 को अंग्रेजों के अत्याचारी और दमनकारी शासन के खिलाफ एक अहिंसक आंदोलन की शुरुआत होती है यह आंदोलन इतना जबरदस्त होता है कि ब्रिटिश शासन के न्यू हील जाती है | इस लोकप्रिय आंदोलन को भारतीय इतिहास में सविनय अवज्ञा आंदोलन के नाम से जाना जाता है |

दांडी मार्च के जरिए ही गांधी जी ने अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानूनों के उल्लंघन के प्रतीक के रूप में समुद्र तट पर नमक बनाकर उनके काले कानून को तोड़ा था |

कारण 

असहयोग आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियां लगातार जारी रही इसके साथ ही 1930 के दशक में कई ऐसी घटनाएं घटी जिसने भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी |

  • अंग्रेजों द्वारा नेहरू रिपोर्ट को रिजेक्ट कर देना
  • आर्थिक मंदी से पूरे देश का प्रभावित होना
  • औद्योगिक और व्यवसायिक वर्ग का सरकारी नीतियों से नाराज होना
  • औद्योगिक मजदूरों का खस्ताहाल होना
  • भारत में विद्रोही और हिंसात्मक संघर्ष बढ़ने की संभावना
  • साइमन कमीशन और रौलट एक्ट जैसे दमनकारी नीतियां आई

यह तमाम ऐसे मुद्दे थे जो साल 1929 के आते-आते एक सशक्त आंदोलन के मनोदशा तैयार कर दी थी | कांग्रेस कार्यसमिति ने आंदोलन की बागडोर गांधीजी को सौंप दी|  महात्मा गांधी को इस बात का पूरा तरह से विश्वास था कि बिना भारतीयों के सहयोग से अंग्रेज भारत में शासन नहीं कर सकते हैं इसी बात को ध्यान में रखते हुए गांधी जी ने सरकार के सामने अपनी कई शर्ते रखी जैसे कि पूरे देश में शराबबंदी नमक कर खत्म किया जाए और सेना के खर्च में 50% की कमी की जाए |

हालांकि आंदोलन शुरू करने से पहले गांधी जी ने वायसराय को पत्र लिखकर समझौते की भी कोशिश की थी लेकिन जब सारी कोशिशें नाकाम रही तब गांधी जी ने निराश होकर कहा था .

मैंने घुटने टेक कर रोटियां मांगी

और बदले में मुझे पत्थर मिला

इसके साथ ही गांधी जी ने कांग्रेस के मंच से सत्याग्रह की शुरुआत कर दी आंदोलन की शुरुआत दांडी तट पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ने की प्रक्रिया से शुरू करने का फैसला लिया गया  |

5 अप्रैल को याद दल दांडी पहुंच गया और गांधी जी के द्वारा 6 अप्रैल को आत्म शुद्धि करने के बाद समुद्र तट से थोड़ा सा नमक उठाकर नमक कानून को तोड़ दिया गया |

6 अप्रैल को गांधी जी को यरवदा जेल में बंद कर दिया गया लेकिन इसके पहले ही गांधी जी ने अपने अनुयायियों के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर दी थी|  इस तरह देखते देखते पूरे देश के लोग सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के लिए सड़कों पर उतर आए|

दांडी मार्च के तर्ज पर तमिलनाडु में सी राजगोपालाचारी ने तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक मार्च किया

धरसना के नमक कारखाने पर सरोजिनी नायडू के नेतृत्व वाले दल ने मार्च किया दर्शना में मार्च करने वाले निहत्थे भीड़ पर अंग्रेज सरकार ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया

ब्रिटिश पुलिस की इस अत्याचार को अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर द्वारा काफी बेहतरीन तरीके से प्रसारित किया गया | इसके वजह से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सविनय अवज्ञा आंदोलन चर्चा का केंद्र बन गया इसी के साथ मध्य प्रदेश में जंगल कानून और कोलकाता में सेडिशन कानून का उल्लंघन किया गया ।

पश्चिमोत्तर प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान ( सीमांत गांधी ) के नेतृत्व में खुदाई खिदमतगार के द्वारा आंदोलन को आगे बढ़ाएं गया वही नागालैंड में 13 वर्ष की रानी गोडि न ल्यु ने विद्रोह का झंडा उठा लिया |

ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को लेकर काफी सख्त रवैया अपनाया और सभी बड़े नेताओं को जेल में बंद कर दिया ब्रिटिश प्रशासन के द्वारा आंदोलनकारियों को पर लाठी-डंडों के अलावा गोलियां और बम का भी प्रयोग किया गया |

टैक्स न देने वाले लोगों की संपत्ति जब कर ली गई ब्रिटिश सरकार जब तमाम प्रयासों के बावजूद इस आंदोलन को कुचल नहीं पाई तो मजबूरी में उन्होंने समझौते के लिए हाथ आगे बढ़ाएं गांधी जी और इरविन के बीच गांधी इरविन समझौता हुआ|  जिसमें तेज बहादुर सप्रू और डॉक्टर जयकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई  |
इसके साथ ही समुद्र के किनारे रहने वाले लोगों को नमक बनाने की अनुमति प्रदान कर दी गई नमक के मुद्दे से शुरू होकर या आंदोलन एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया |

दांडी मार्च पर संछिप्त विवरण

इतिहास में आज का दिन 12 मार्च बहुत ही खास है क्योंकि 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी जी ने दांडी मार्च की शुरुआत की थी यह दिवस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अहम पड़ाव के रूप में जाना जाता है भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने इस दिन अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से नमक सत्याग्रह के लिए दांडी यात्रा शुरू की थी

 महात्मा गांधी के द्वारा दांडी मार्च
गाँधी जी के साथ जाते कुछ लोग

दांडी यात्रा का अर्थ व स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव

दांडी मार्च का अभिप्राय उस पैदल यात्रा से है जो महात्मा गांधी और उनके स्वयंसेवकों द्वारा 12 मार्च 1930 ईस्वी को प्रारंभ की गई थी दांडी यात्रा का स्वतंत्रता आंदोलन पर अध्यात्मिक गहरा प्रभाव पड़ा था | उस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक उत्पाद पर कानूनी तरीके से जबरन टैक्स वसूली का निर्णय लिया गया था |

महात्मा गांधी जी ने इस कानून के खिलाफ सन 1930 में साबरमती आश्रम से दांडी तक पदयात्रा की थी 12 मार्च 1930 को इस दांडी यात्रा में हजारों देशभक्तों ने हिस्सा लिया था | यह यात्रा 241 मील दूर 12 मार्च से 6 अप्रैल 24 दिनों तक चली थी | दांडी मार्च ने अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष के लिए पूरे भारत में एकजुट कर दिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा |

दांडी मार्च का उद्देश्य

दांडी मार्च का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा बनाए गए नमक कानून को तोड़ना था नमक कानून को इसलिए थोड़ा जा रहा था क्योंकि सरकार द्वारा नमक और बढ़ा दिया गया था|  जिससे रोजमर्रा की जरूरत के लिए नमक की कीमत बढ़ गई थी | नमक कानून भारत के और भी कई भागों में तोरा गया था जैसे आश्रम में लोगों ने सिलहट से नोआखाली तक की यात्रा की राजगोपाल चारी ने त्रिचनापल्ली से  वेदारायण तक की यात्रा की थी | इन सभी लोगों ने मिलकर नमक कानून को तोड़ा |

निष्कर्ष

दांडी यात्रा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की युगल कारी घटनाओं में से एक है जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के स्वप्न को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | इस यात्रा के जरिए गांधी जी ने सत्य और असत्य अहिंसा के दम पर अंग्रेजों की सत्ता को उखाड़ दिया और भारत को आजादी दिलाई थी |

 

 

 

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