फ्रांस की क्रांति

फ्रांस की क्रांति 1789 से 1799 फ्रांस की निरंकुश एवं एंव राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध एक क्रांति थी| जिसके मूल के असमानता और भेदभाव आधारित सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था विद्यमान थी इस क्रांति ने संपूर्ण विश्व में स्वतंत्रता समानता एवं बंधुत्व पर आधारित मापदंडों को प्रसारित किया |

बाद में नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांसीसी साम्राज्य के विस्तार द्वारा कुछ अंश तक इस क्रांति को आगे बढ़ाया क्रांति के फलस्वरूप राजा को गद्दी से हटा दिया गया एक गणतंत्र की स्थापना हुई |खूनी संघर्षों का दौर चला और अंततः नेपोलियन की तानाशाही स्थापित हुई | जिससे इस क्रांति के अनेकों मूल्यों का पश्चिमी यूरोप में तथा उसके बाहर प्रसार हुआ | इससे विश्व भर में निरपेक्ष राजतंत्र का ह्रास होना शुरू हुआ | नए गणराज्य एवं उदार प्रजापत्य बने |

फ्रांस की क्रांति की पृष्ठभूमि

यूरोप में पुरातन व्यवस्था थी जिसमें निरंकुश राजतंत्र सामान्य ,कुलीन तंत्र ,चर्च व्यवस्था, विशेषाधिकार, संयुक्त समाज ,कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और कुशल वित्तीय संस्थाएं थी |

फ्रांसीसी क्रांति के कारण .

राजनीतिक कारण

  • लुई 14वां ( 1643 – 1715 ) तक यह एक योग्य शासक था और इसने अत्यधिक केंद्रीकृत शासन प्रणाली को अपनाया था जो कि सभी निर्णय राजा लेता था इसके बाद के शासक लुईस 15 वा लुई सोलहवा यह दोनों अयोग्य शासक हुए यह बहुत ज्यादा शासन तंत्र को संभाल नहीं पाए इनकी अयोग्यता के कारण लुई 14 वा का केंद्रीकृत शासन प्रणाली विफल हो गया ।
  • निरंकुश राजतंत्र .. ऐसा माना जाता था कि राजा इसलिए राजा है क्योंकि उसको भगवान ने शासन करने के लिए भेजा है और उसके विरुद्ध कोई प्रश्न नहीं उठा सकता है ।
  • स्वतंत्रताओं का अभाव : यहां पर बहुत ही ज्यादा केंद्रीय कृत शासन प्रणाली थे इस कारण यहां जो सामान्य लोग थे उनमें बहुत ज्यादा स्वतंत्रता का अधिकार नहीं था |
  • राज प्रसाद का विलासी जीवन और धन का उपाय : यहां की राजाओं और राजसत्ताओ मैं जितने भी लोग थे वह सभी भोग एवं बिलासी लोग थे वह बहुत ज्यादा धन का खर्च करते थे जिससे लोगों में विद्रोह होने लगा |
  • प्रशासनिक अव्यवस्था : यहां पर योग्यता के आधार पर नियुक्ति नहीं होती थी यहां पर वंश के आधार पर नियुक्ति होती थी क्योंकि यहां पर कुलीन तंत्र का वर्चस्व था एवं भिन्न भिन्न प्रांतों में अलग-अलग कानून थे तथा स्वतंत्र न्यायपालिका नहीं थी जिससे कि कोई गरीब व्यक्ति को इंसाफ नहीं मिल पा रही थी |

सामाजिक कारण

शोषक वर्ग ( विशेषाधिकार युक्त )

 प्रथम स्टेट ( 1st State ) = पादरी वर्ग – धार्मिक प्रमुख , करमुक्त जमीन , कर लगाने का अधिकार

  • उच्च पादरी – सुविधापूर्ण जीवन , धन का नियंत्रण .
  • निम्न पादरी- इनकी स्थिति जनसाधारण के समान थी.

द्वित्तीय स्टेट ( 2nd State ) = कुलीन / सामंत वर्ग – राज्य के उच्च पदों पर चयनित , करों से मुक्त , कृषक वर्ग पर कर आरोपित करने का अधिकार शोषक वर्ग ( विशेषाधिकार युक्त )

तृत्तीय स्टेट ( 3rd State ) = सामान्य वर्ग – कृषक , मजदूर , श्रमिक आदि । सर्वाधिक शोषित और पीड़ित , करों का बोझ मजदूर वर्ग – औद्योगिक क्रान्ति = घरेलू उद्योग – धंधों का विनाश = मजदूर वर्ग बेरोजगार = रोजगार की तलाश में पेरिस की ओर पलायन ii . मध्यम वर्ग – सर्वाधिक असंतोष , क्रांति का संचालन और नेतृत्व .

आर्थिक कारण :

  •  .एकमात्र करदाता वर्ग तृत्तीय स्टेट जनसाधारण था , कारों का बोझ बढ़ा ,
  •  सप्तवर्षीय युद्र – फ्रांस बनाम ब्रिटेन ( लुई 15 वां ) , अमेरिकी क्रांति ( लुई 16 वां ) में अमेरिका के पक्ष में सहयोग जैसे विदेशी युद्ध में व्यय और बढ़ा |
  • राजमहल के विलासिता के अपव्यय
  • कर सुधार के सुझावों का विरोध – आर्थिक विचारक ( Physiocrats ) – नेकर , तुर्गा , कैलोन जैसे आर्थिक विचारकों ने राज्य के अपव्यय में नियंत्रण , किसानो पर सामंतों द्वारा लगाए जाने वाले कारों की समाप्ती एवं कुलीनों को भी कर के दायरे  में लाने का सुझाव दिया |

दार्शनिकों की भूमिका / बौधिक जागरण : इस संबंध में दो मत प्रचलित हैं –

  1. दार्शनिकों ने क्रांति उत्पन्न की   |
  2. क्रांति में दार्शनिकों की कोई भूमिका नहीं थी , बल्कि फ्रांस की तत्कालीन राजनीतिक , सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति क्रांति के लिए उत्तरदायी थीं ।

 दार्शनिकों के विचार :

रूसो ( 1712-78 )

  • सोशल कांट्रैक्ट एवं सेकंड डिस्कोर्स रूसो की प्रमुख रचनाएँ हैं ।
  • प्रकृति पर बल – ‘ मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है , पर हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है । ‘
  • असमानता पर चोट – रूसो ने मानव निर्मित नियंत्रण एवं असमानता ( अमीर – गरीब , उच्च – निम्न , श्वेत – अश्वेत , कुलीन – सामान्य आदि ) का विरोध किया |
  • राज्य की उत्पत्ति एवं सामान्य इच्छा का सिद्धांत ( सोशल कांट्रैक्ट ) – संपत्ति की अवधारणा – असुरक्षा की भावना = सामाजिक समझौता = अपनी शक्ति राज्य को सौंप दी = राज्य एवं राजतंत्र की शुरुवात ( रूसो ने समानता एवं स्वतन्त्रता को सामाजिक संगठन का आधार बताया )

वाल्टेयर ( 1694-1778 ) ( संपादकों का राजा ) –

  • प्रत्येक प्रकार के शोषण एवं अंधविश्वास का कटु आलोचक , आस्तिक पर चर्च का विरोधी था  |
  • वाल्टेयर ने कहा ईश्वर मनुष्य के हृदय में बसते हैं ना की बाइबिल एवं चर्च में  |
  • प्रसिद्ध पुस्तके – लुई 14 वें का युग , बदनाम चीजों को नष्ट कर दो |

मांटेस्क्यू ( 1689-1755 ) ( फ्रांसीसी विचारक )

  • देशों की परिस्थिति अनुसार सरकार : बड़े देश – निरंकुश राजतंत्र , मध्यम देश – सीमित राजतंत्र । ( फ्रांस ) छोटे देश – गणतंत्रीय शासन प्रणाली ( स्विट्जरलैंड ) –
  • मानवाधिकार शक्ति पृथककरण का सिद्धान्त एवं नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धान्त ( द स्पिरिट ऑफ द लॉज ) = शक्ति के केन्द्रीकरण से व्यक्तिगत स्वतन्त्रता बाधित होती है ।

  फ्रांस की क्रांति की प्रमुख घटनाएँ ( Emergence & Expansion )

 स्टेट जनरल का अधिवेशन : –
  •  क्रांति से पूर्व समाज तीन स्टेट में विभाजित –
  •  फ्रांस में आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप पादरी एवं कुलीन / सामंत वर्ग को भी करों के दायरे में लाने का सुझाव – प्रथम एवं द्वित्तीय स्टेट ने विरोध किया |
  • पहले करों एवं महत्वपूर्ण मुद्दों पर तीनों स्टेट की पृथक बैठक एवं मतदान में स्टेटों के बहुमत ( किसी भी 2 स्टेट का समर्थन ) से निर्णय का प्रावधान था , प्रत्येक स्टेट में 300 सदस्य थे |
  • 5 मई 1789 को बैठक बुलाई गई |
  • तृतीय स्टेट की जनसंख्या लगभग दोगुनी थी , उन्होंने 600 ( दोगुने ) प्रतिनिधि भेजने एवं तीनों स्टेट की बैठक एक साथ बुलाने की मांग की
  • राज्य द्वारा इस मांग को स्वीकार कर लिया गया परंतु प्रथम एवं द्वित्तीय स्टेट द्वारा विरोध किया गया |
टेनिस कोर्ट की शपथ ( Oath of Tennis Court ) : –
  • फ्रांस के तत्कालीन राजा लुई सोलहवाँ ने सामन्तों , कुलीनों और पादरियों के दबाव में आकर जनसाधारण वर्ग के सदन को बन्द कर दिया –
  • विरोध स्वरूप तृत्तीय स्टेट के सभी सदस्य सभा भवन के निकट स्थित टेनिस कोर्ट के मैदान में इकट्ठे हो गए । तृतीय वर्ग के नेता ‘ मिरबो ‘ के अध्यक्षता में एक संकल्प लिया गया कि जब तक हम देश के संविधान का निर्माण नहीं कर लेते तब तक हम टेनिस कोर्ट से नही हटेंगे ।
 राष्ट्रीय सभा ( National Assembly ) :

तृतीय सदन की इस घोषणा से राजा लुई डर गया और 27 जून , 1789 ई ० को तीनो सदनों की संयुक्त बैठक का की अनुमति दे दी । एसेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा की मान्यता दे दी । इस सभा ने 91 जुलाई , 1789 को संविधान का कार्यभार ग्रहण किया ।

   बास्तील का पतन : –
  • राजा और सामन्तों ने मिलकर इस सभा को भंग करने की योजना बनाई । पेरिस में यह अफवाह फैल गयी की कि राजा विदेशी सेना की मदद से देशभक्तो और क्रांतकरियों को मार डालना चाहती है । इस पर पेरिस की जनता उत्तेजित हो गयी और 14 जुलाई , 1789 को फ्रांस की जनता ने बास्तील की जेल को नष्ट कर दिया और कैदियों को मुक्त कर दिया । इस तिथि को फ्रांसिसी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते है|
नागरिक सभा एवं राष्ट्रीय रक्षा दल : –
  • बिगड़ते कानून – व्यवस्था को नियंत्रित करने हेतु लाफायत नमक सैनिक कमांडर के नेतृत्व में राष्ट्रीय रक्षा दल ( National Guard ) और पेरिस के शासन हेतु नागरिक सभा ( कम्यून ) की स्थापना की गई ।
   संविधान सभा एवं मानव अधिकारों की घोषणा :
  • संविधान सभा , राष्ट्रीय सभा का ही परिवर्तित रूप था , 1791 में संविधान निर्माण कार्य पूर्ण हुआ ।
  • स्वतन्त्रता , समानता , बंधुत्व , संपत्ति , सुरक्षा एवं अत्याचार के विरोध का अधिकार , कानून के समक्ष समानता , धार्मिक स्वतन्त्रता , कानून निर्माण आदि अधिकारों की घोषणा की गई ।
 व्यवस्थापिका सभा – जिरोंदिस्त एवं जैकोबिन दल ( 1791-92 ) :

1791 में संविधान निर्माण के पश्चात संविधान सभा भंग कर दी गई , एवं 745 सदस्यीय व्यवस्थापिका सभा का गठन हुआ । जिसमें दो प्रमुख दल थे.

  1. वैध राजसत्तावादी- राजतंत्र एवं संविधान समर्थक
  2. गणतन्त्रवादी – राजतंत्र विरोधी एवं गणतन्त्र समर्थक , जिरोंदिस्त एवं जैकोबिन दल
  • जिरोंदिस्त दल – जिरोन्द प्रांत के नाम पर , अधिकांश जिरोन्द प्रांत के निवासी , शिक्षित परंतु राजनीतिज्ञ नहीं , इनकी पकड़ पेरिस पर नहीं थी ये पेरिस का विरोध करते थे , प्रमुख नेता – इस्रार , पेसिओं , ब्रिसो , मादाम रोलां , टॉमस पेन आदि ।
  • जैकोबिन दल – जैकोबो नमक चर्च के नाम पर , गुप्त सभा स्थल , अनुशासित एवं संगठित , पेरिस पर पकड़ , प्रमुख नेता – दाँतो , रोबेस्पियर आदि ।

इसे भी पढ़े :   सिंधु जल समझौता चर्चा में क्यों है ?

नेशनल कन्वेन्शन एवं आतंक का राज्य : उग्र गणतन्त्रवाद का चरण ( 1792-95 )
  •    सरकार के शासन तंत्र में जैकोबिन दल का प्रभुत्व ,
  • कन्वेन्शन के समक्ष तीन प्रमुख समस्या – विदेशी आक्रमण , राजा की उपस्थिती एवं गृहयुद्द ।
  •   प्रस्ताव पारित कर राजतंत्र को समाप्त कर दिया गया एवं राजा लुई 16 वें को 2 जनवरी 1793 को मृत्युदंड दे दिया गया ।
  •  जिरोंदिस्त एवं जैकोबिन दल के मध्य संघर्ष प्रारम्भ , रोबेस्पियर ने आतंक के राज्य की शुरुवात की |
  •   क्रांति विरोधियों के विरुद्ध सार्वजनिक रक्षा समिति , सामान्य सुरक्षा समिति एवं क्रांतिकारी न्यायालयों का गठन किया गया एवं भरी संख्या में विरोधियों को क्रांति का शत्रु बताकर उनकी हत्या कर दी गई ।
डायरेक्टरी का शासन- नेपोलियन का उदय : उदार गणतन्त्रवाद का चरण ( 1795-99 ) –
  •  नेशनल कन्वेन्शन द्वारा निर्मित संविधान के तहत कार्यपालिका का उत्तरदायित्व 5 सदस्यों वाली निदेशक मण्डल ( डायरेक्टरी ) को सौंपा गया |
  •  फ्रांस की स्थिति बिगड़ी परंतु यह मध्यवर्ग के उत्कर्ष का काल था |
  •  पैथियन विद्रोह एवं नेपोलियन का उदय – पूजीवादी मध्यमवर्गीय शासन से फ्रांस को मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से 1795 में पैथियन सोसायटी की स्थापना नोएफ बाबूफ के के नेतृत्व में की गई , परंतु नेपोलियन ने इस विद्रोह का दमन कर दिया ।
  •  – अराजकता , भ्रष्ट शासन , व्यापार – व्यवसाय की अवनति तथा असफल विदेश नीति के कारण गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई और अंततः नेपोलियन के डायरेक्टरी के शासन का अंत कर सत्ता पर अधिकार कर लिया ।

   फ्रांसीसी क्रांति के प्रभाव ( Effect of French Revolution ) ।

  • स्वतंत्रता , समानता एवं बंधुत्व के नारे का प्रसार.
  •  लोकतांत्रिक सिद्धान्त का विकास : राजा के दैवी सिद्धान्त का अंत कर लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त को मान्यता , मानवधिकारों की घोषणा ने व्यक्ति की महत्ता को प्रतिपादित किया और यह सिद्ध किया कि सार्वभौम सत्ता जनता में निहित है और शासन का अधिकार जनता से आता है ।
  •  सामंतवाद की समाप्ति : सामंती विशेषाधिकारों का अंत
  • राष्ट्रवाद का प्रसार : फ्रांस में एवं फ्रांस के बाहर भी फ्रांसीसी क्रांति ने राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार ) किया और नेपोलियन के साम्राज्यवादी विस्तार को रोका ।
  •  – धर्मनिरपेक्षता की भावना का प्रसार : अब धर्म व्यक्तिगत विश्वास की वस्तु बन गई ।
  •  – सैन्यवाद का विकास : नागरिकों के लिए सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी गई ।
  •  अधिनायकवाद की शुरुआत.
  • – समाजवाद का मार्ग प्रशस्त.

   फ्रांस में ही क्रांति क्यों हुई ? ( Why this happened in France ? )

  •  18 वीं सदी का यूरोप जर्जर भवन के समान था जो कहीं से भी ढह सकता था  |
  •  राष्ट्रीय राज्य की स्थापना – राजनीतिक एकता , राष्ट्रव्यापी जनमत , राष्ट्रव्यापी आंदोलन की पृष्ठभूमि |
  • किसानों का अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में अधिक जागरूक होना.
  • सामंतों का विद्रोह – लुई 13 वें द्वारा सामंतों के राजनीतिक अधिकार समाप्त , लुई 16 वें अयोग्य शासक था |
  •  अति – केंद्रीयकृत राज्यव्यवस्था ( लुई 14 वां ) , योग्य शासक आवश्यक , लुई 15 एवं 16 वां अयोग्य शासक था |
  •   वैचारिक क्रांति एवं प्रेरित होने वाले शिक्षित एवं वंचित मध्य वर्ग .
  • अमेरिकी क्रांति का प्रभाव – लाफायते ( सैनिक कमांडर ) ने अमेरिकी क्रांति के आदर्शों का प्रसार किया
  •  – फ्रांसीसी सैनिकों में असंतोष – बकाया वेतन , अच्छे वस्त्र व भोजन का अभाव.

   फ्रांसीसी क्रांति का स्वरूप ( Nature of French Revolution ) –

  • मध्यवर्गीय स्वरूप – क्रांति के दौरान नेतृत्व , क्रांति पश्चात निर्मित संविधान , नेपोलियन द्वारा किए गए सुधारों का प्रत्यक्ष संबंध मध्यवर्ग से था  |
  • वैश्विक स्वरूप – फ्रांस की क्रांति सिर्फ फ्रांस में सीमित ना रहकर अन्य देशों के लिए भी अनुकरणीय रहा , स्वतन्त्रता , समानता तथा भातृत्व , लोकतंत्रात्मक आदर्शों का पूरे विश्व में प्रसार हुआ |

 

 

 

 

comment here