महात्मा बुद्ध और उनके द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की थी | यह भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न होने वाले संसार के प्रमुख धर्मों में से एक है | भारत की नास्तिक दर्शन विचारधाराओ में बौद्ध धर्म प्रमुख है, इस धर्म की उत्पत्ति जरूर भारत में हुई है, लेकिन आज यह श्रीलंका, मयमार ,लाओस ,कंबोडिया, थाईलैंड और चीन का प्रमुख धर्म है |

बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म शाक्य वंश का राजा शुद्धोधन और रानी महामाया के यहां हुआ था |

एक बार एक व्यक्ति ने सन्यासी को गालियां दी वह चुपचाप सुनते रहे और उस व्यक्ति का गाली देना बंद हुआ तो सन्यासी ने पूछा वतस् यदि कोई दान को स्वीकार ना करें तो उस स्थान का क्या होगा ।

व्यक्ति ने उत्तर दिया कि ‘ वह देने वाले के पास ही रह जाएगा तो सन्यासी ने कहा मैं तुम्हारी गालियां स्वीकार नहीं करता इस तरह के संयम और धर्म को प्राप्त करने वाले यह सन्यासी एशिया के ज्योतिपुंज कहे जाने वाले महात्मा बुद्ध थे ।

उनका जन्म नेपाल के लुंबिनी में माना जाता है इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था संसारीक दुखों से द्रवित होकर उन्होंने 29 साल की आयु में गृह त्याग दिया था बाद में उन्हें 35 साल की आयु में ज्ञान प्राप्त हुआ तब से राजकुमार सिद्धार्थ, महात्मा बुध कहलाने लगे ।

ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना पहला प्रवचन वाराणसी के पास सारनाथ स्थान में दिया  | एक परंपरा के मुताबिक गौतम बुध 483 ईसा पूर्व में कुशीनगर स्थान पर अपना शरीर त्यागा था ।

बौद्ध धर्म में गृह त्याग की घटना महाभिनिष्क्रमण पहले प्रवचन की घटना धर्म चक्र प्रवर्तन और शरीर त्याग की घटना महापरिनिर्वाण कहलाता हैं ।

महायान ‘ हिनयान , ब्रजयान , स्वतातरिक , सम्मितीय ‘ थेरवाद ,बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय माने जाते हैं ।

बौद्ध धर्म के उदय के प्रमुख कारण

वैदिक समाज चार वर्गों में विभाजित था और हर वर्ण के कर्तव्य अलग-अलग निर्धारित थे । जिनमें ब्राह्मण और क्षत्रियों को विशेषाधिकार मिले हुए थे । वैश्य खेती और पशुपालन करते थे ।वही शूद्रों का कर्तव्य ऊपर के तीनों वार्णो का सेवा करना था |

 

यह स्वाभाविक ही था कि इस तरह के वर्ण विभाजन वाले समाज में तनाव की स्थिति पैदा हो जाए ब्राह्मणों के प्राप्त विशेष अधिकारों पर क्षत्रिय आपत्ति करते थे लिहाजा ब्राह्मणों के सृष्टि के विरुद्ध क्षत्रियों का खड़ा होना बौद्ध धर्म के उदय का एक प्रमुख कारण बना गौरतलब है कि बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध भी क्षत्रिय थे इसके अलावा बौद्ध धर्म के उद्भव के कुछ अर्थ कारण है ।

इसे भी पढ़े :    प्राचीन भारतीय इतिहास का महत्व

पहला कारण :  सिक्को के प्रचलन से जब व्यापार बढा तो वैश्यो की स्थिति में सुधार हुआ | अब वे सामाजिक प्रतिष्ठा भी चाहते थे, ब्राह्मणों की कानून की किताबों में शुद्ध खोरी की निंदा की जाती थी. इसीलिए वैश्य किसी ऐसे धर्म को अपनाना चाहते थे । जहां वह सम्मान पा सके |

दूसरे कारण :  कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पशुओं की जरूरत वैदिक व्यवस्था में पशुओं की बलि दी जाती थी जबकि या धर्म अहिंसा का समर्थन करता था इस कारण लोग बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए | वहीं अगर लोगों के बीच प्रचार-प्रसार की बात करें तो पहला कारण है यह धर्म जातिगत भेदभाव का स्थान नहीं देता था इससे लोगों में सामाजिक चेतना का संचार बढ़ा और वह इस धर्म के प्रति आकर्षित हुए |

तीसरा कारण : बौद्ध धर्म आत्मा एवं परमात्मा के बाद विवादों में उलझने के बजाय सांसारिक समस्याओं पर केंद्रित था

चौथा कारण : इस धर्म में जनसाधारण की भाषा पाली को प्रचार का माध्यम बनाया गया

पांचवा कारण : बौद्ध धर्म के संग में प्रवेश जातियां लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता था

हर धर्म उत्पत्ति से ही कुछ सिद्धांतों पर आधारित होता है जो उस धर्म का दर्शन कहलाता है ।

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत

बौद्ध धर्म के तीन सार्व भौमिक सत्य , चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग मिलकर बौद्ध धर्म का निर्माण करते हैं ।

सार्व भौमिक सत्य

  • . ब्रह्मांड में सब हमेशा व्याप्त रहता है जैसे पदार्थ ऊर्जा में बदलता है ऊर्जा पदार्थ में बदलती है
  • . संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है इसमें जीवन को बहती नदी की तरह माना गया है
  • . इसके अनुसार आप जैसा करते हैं वैसे ही आपके साथ होता है

चार आर्य सत्य 

बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य बुद्ध की शिक्षाओं का सार है बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए इन सत्य को समझा |

. दुख अर्थात संसार दुख में है |

आर्य सत्य के अनुसार दुख कई रूपों में होता है जीवन में व्यक्ति बहुत सारी इच्छाएं रखता है जब मनुष्य इन इच्छाओं को पूरा करने में असमर्थ होता है | तो उसे दुख होता है ,अगर इच्छाओं की पूर्ति होगी जाए तो भी यह तृप्ति थोड़ी समय के लिए ही होती है, क्योंकि सुख हमेशा नहीं रह सकता. यदि सुख हमेशा व्याप्त रहा तो जीवन में उदासीनता आ जाती है |

. समुदाय अर्थात इस दुख का कारण है

दुख की उत्पत्ति की प्रमुख कारण इच्छा है | बुद्ध ने इसे तीन बुराइयों के रूप में समझा है यह तीन बुराइयां है लालच उपेक्षा और नफरत |

निरोध अर्थात इस दुख का निरोध है

व्यक्ति को ऐसी सभी इच्छाओं का त्याग करना चाहिए जो दुख का कारण बनती है इसके लिए मोह का त्याग करना होता है इससे व्यक्ति निर्माण यानी ज्ञान प्राप्ति की ओर बढ़ता है इसमें लालच उपेक्षा और नफरत को त्यागना होता है

 मांगा दुख निरोध का मार्ग है

बुद्ध ने इन दुखों का अंत करने के लिए उपचार बताया है इससे अष्टांगिक मार्ग के नाम से जाना जाता है |

दरअसल व्यवहारिक तौर पर महात्मा बुद्ध की तुलना डॉक्टर से की जा सकती है जैसे पहले दो आर्य सत्य में वह समस्या और उसके कारण को समझते हैं जबकि वे तीसरे आर्यसत्य में समस्या के निदान के बारे में बताते हैं वहीं चौथे उपचार में विधि के बारे में बताया गया है इसे ही अष्टांगिक मार्ग करते हैं |

अष्टांगिक मार्ग में 8 साधन होते हैं |

  • सम्यक दृष्टि
  • सम्यक संकल्प
  • सम्यक वाक्
  • समयंक कमाणंत
  • सम्यक अजीव
  • सम्यक व्यायाम
  • सम्यक् स्मृति
  • सम्यक समाधि

व्यक्ति इस मार्ग के जरिए निर्वाण प्राप्त कर सकता है |

बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए एक अचार संहिता भी लागू की थी जिसके अनुसार मुख्य नियमों में पराया धन के लोभ  नहीं करना, हिंसा नहीं करना, नशे का सेवन ना करना, झूठ ना बोलना और दुराचार से दूर रहना शामिल है | इसके अलावा बुद्ध ने मध्यम मार्ग की शिक्षा दी जिसके अनुसार ना अत्यधिक विलास करना चाहिए ना ही अत्यधिक संयम |

बौद्ध धर्म के प्रमुख विशेषताएं

बौद्ध धर्म ईश्वर एवं आत्मा को नहीं मानता है | लेकिन पुनर्जन्म में विश्वास करता है इसीलिए कर्म फल का सिद्धांत भी बौद्ध धर्म में मान्य है दूसरी तरफ इस में वर्ण व्यवस्था की निंदा की गई है संघ में स्त्रियों का प्रवेश का अधिकार था ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और जनतांत्रिक स्वरूप लिए हुए था |

बौद्ध धर्म के सामाजिक आंदोलन

कोई भी सामाजिक आंदोलन अपने समय की सामाजिक बुराइयों को मिटाने का प्रयास करता है | बौद्ध धर्म ने भी अपने समय में प्रचलित रूडीगत मान्यताओं पर अंकुश लगाने का प्रयास किया  | इस धर्म में उस समय प्रचलित जातिगत धर्म भेदभाव को नकारा और वर्ण व्यवस्था की निंदा की जहां ब्राह्मण धर्म में शूद्रों और स्त्रियों की स्थिति निम्न मानी जाती थी , वही बौद्ध धर्म में शुद्र एवं स्त्रियों को संघ में प्रवेश किया जाता था  |

बौद्ध धर्म में धन संचय की मनाही की गई थी जिसमें समाज में व्याप्त असमानता पर गहरी चोट की इसके अलावा लोगों में चेतना के विकास करने का प्रयास किया गया स्वयं बुद्ध ने अपने अनुयायियों से कहा कि मेरे उपदेशों को वैसे हि न अपनाया जाए बल्कि तार्किक ढंग से विचार करके ही इनका पालन किया जाए |

समकालीन समय में बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता

बौद्ध धर्म की विशेषताएं
                                                                       बौद्ध धर्म की विशेषताएं

बौद्ध धर्म का प्रमुख मूल्य अहिंसा आज के समय में बढ़ रही अपराधी प्रवृत्ति को रोकने और कम करने में प्रमुख भूमिका निभा सकती है | आज का विश्व चरमपंथी ताकतों और एक तरफा सोच का सामना कर रहा है मसलन किसी एक तथ्य के आधार पर विचारों को सही मान लेना जैसी प्रवृतियां बढ़ रही है |

ऐसे में मध्य मार्ग का सिद्धांत प्रासंगिक है दूसरी तरफ बौद्ध धर्म में दिया गया ,आप दीपो  भव् , व्यक्ति के लिए हर समय और काल में प्रासंगिक है इसके अनुसार व्यक्ति को अपना रास्ता स्वयं तय करना होगा |

आज लोगों में अवसाद निराशा और आत्महत्या जैसे प्रवृतियां बढ़ रही है इनसे निपटने में या सिद्धांत कारगर साबित हो सकता है | आज भ्रष्टाचार न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चुनौती के रूप में उभरा है | बौद्ध धर्म में धन संचय करने का सिद्धांत इस चुनौती में सहायक सिद्ध हो सकता है |

गौरतलब है कि भारतीय समाज में आज भी जाति व्यवस्था व्याप्त है और इस आधार पर होने वाला भेदभाव कम से कम आज के समाज में स्वीकार नहीं होना चाहिए ।

read  more :

⇒  RIP का मतलब क्या होता है | rip meaning in hindi | RIP का फुल फॉर्म क्या होता है

⇒  क्रिप्टोकरेंसी क्या है | क्रिप्टो करेंसी की कीमत कैसे तय होती है

⇒  रूसी क्रांति क्या है | रूसी क्रांति के कारण और परिणाम क्या थे

दोस्तों हम उम्मीद करता हु की आप इस आर्टिकल में जाने होंगे अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो आप कमेंट करके आपना प्यार दे सकते है. हमें इंतजार कर रहे है |

आप इस आर्टिकल को facebook पर पढ़ सकते है  follow करे . क्लिक करे 

 

comment here