भारतीय चित्रकला

सर्वप्रथम ऋग्वेद में चमड़े पर बने चित्र का उल्लेख प्राप्त होता है । छठी सदी ईसा पूर्व भारतीय चित्रकला के अस्तित्व की सूचना देता है ।  कालीदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् में चित्र रचना के सन्दर्भ में विवरण दिया  है । वात्स्यायन के कामसूत्र और विशाखदत्त कृत मुद्रारक्षस में क्रमश भारतीय चित्रकला की सामग्रियों एवं चित्रपटों का विवरण मिलता है ।

 

सामान्यत : भारतीय चित्रकला के 4 रूप मिलते हैं

( 1 ) भित्ति चित्र– जिसके नमूने बाघ , अजन्ता , बादामी एवं सित्तनवासल की गुहा भित्तियों पर मिलते हैं ।

( 2 ) चित्रपट– यह चमड़े या कपड़े के टुकड़ों पर की जाती थी ।

( 3 ) चित्रफलक– इसमें चित्रांकन धातुओं , पत्थरों अथवा लकड़ी के टुकड़ों पर किया जाता था ।

( 4 ) लघु चित्रांकन– इस प्रकार के चित्र किताबों के पृष्ठों , वस्त्रों के टुकड़ों तथा कागजी टुकड़ों पर बनाया जाता है ।

अजन्ता के चित्रों का निर्माण शुंग , कुषाण , गुप्त आदि अनेक राजाओं के समय ( ई . पूर्व प्रथम शती से लेकर सातवीं शती ई . तक ) हुआ । अजन्ता में कला की खोज सन् 1834 में सर अलेक्जेण्डर ने की । अजन्ता की कुल छोटी बड़ी 30 गुफाएं हैं ।

इनके दो प्रकार हैं

( 1 ) धक स्तूप गुफा ,

( 2 ) विहार गुफा ।

अजन्ता की चित्रावली का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर उसमें लगभग 20 प्रकार की विभिन्न शैलियों का समावेश पाया गया

बौद्ध चित्रकला की तीन शैलियाँ बतायी गई

( 1 ) देव शैली ,

( 2 ) यक्ष शैली

( 3 ) नाग शैली 

गुफा नं . 16 के 2 चित्र अतीव महत्त्वपूर्ण हैं

( 1 ) गहरी रात में बुद्ध का गृह त्याग का ,

( 2 ) ऐसी स्थिति में होते हुए यशोधरा और राहुल पर दृष्टिपात करते हुए बुद्धदेव अंकित किये गये हैं ।

बाघ की गुफाएं मध्य प्रदेश के धार जिले में विन्ध्य पर्वत श्रृंखला जंगल के उस भाग में हैं जहां आज भी घने जंगल और भीलों की बस्तियाँ हैं । इनमें गुफाओं की संख्या 9 है । पहली गुफा गृह गुफा है और दुसरी गुफा थेथ के नाम से प्रसिद्ध है । हाथी गोला और रंग महल आदि की भी । गुफाएं हैं ।

तीन गुफाएं जो महायान से संबंधित थी विनिष्ट हो चुकी हैं । इसके अधिकतर चित्र जातक कथाओं पर आधारित है , बाघ की गुफाओं में प्रकृति का मानवीय चित्रण है । बम्बई के समीप एलीफेन्टा गुफा के मन्दिर में 9 बड़ी प्रतिमाएँ हैं जिसमें भगवान शिव विविध रूपों को दर्शाया गया है ।

सर्वाधिक आकर्षक प्रतिमा त्रिमूर्ति शिव की है जो 23-24 फीट चौड़ी और 18 फीट ऊँची है । त्रिमूर्ति में अकेले शिव के ही तीन रूप हैं । भगवान शंकर की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा में तो दर्शन और कला का अनुपम संयोग है । इसमें पार्वती के विवाह को बहुत ही सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।

एलोरा की गुफाएं , अजन्ता से लगभग 50 मील की दूरी पर स्थित हैं । यहां के मंदिरों में अनेक भित्ति चित्र बने हैं , जिनमें कैलाशनाथ , लंकेश्वर , इन्द्रसभा और गणेश आदि के चित्र बड़े ही आकर्षक हैं । एलोरा की गुफाएं बौद्ध , हिन्दू तथा जैन संप्रदायों से संबद्ध है ।एलोरा में बौद्ध गुफाओं की संख्या 12 है ।

बादामी की गुफाएं भी बम्बई के पास है ।  यहां से चालुक्य शैली के चार गुहा मन्दिर मिले हैं ।  सित्तनवासन तमिलनाडु प्रदेश में तंजौर के समीप स्थित है । यहाँ पर पल्लव नरेश महेन्द्रवर्मन- I तथा उसके पुत्र नरसिंहवर्मन ने अनेक गुफा मन्दिरों का निर्माण करवाया था ।

अमीर खुसरो के ‘ खामोश ‘ में दृश्यों का चित्रण अत्यन्त सहज ढंग से तथा रंगसाजी का कार्य अत्यन्त प्रभावोत्पादक तथा आकर्षक शैली में तूलित प्राप्त होता है । लोरचन्दा जो कि सम्भवतः जौनपुर के हुसैन शाह शर्की के शासनकाल में उत्कीर्ण किया गया था , जो राजपूत एवं फारसी शैली का मिश्रित रूप प्राप्त होता है ।

सल्तनतकालीन चित्रकला शैली के प्रसिद्ध नमूनों में 1533 ई . में चित्रित फिरोजशाह तुगलक का चित्र , बीकानेर की ‘ रंगमाला लघु चित्रावली ‘  जिसे विजयनगर तथा तुर्की शैलियों के मिश्रित रूप से तैयार किया गया था ।

चित्रकला की शैलियों में प्रमुख हैं – पाल शैली , पटचित्र , गुजरात शैली , अपभ्रंश शैली , जैन शैली , मेवाड़ शैली , राजपूत शैली , किशनगढ़ शैली , दक्कन शैली , मारवाड़ चित्रकला शैली , कोटा – बूंदी शैली आदि ।

राजस्थान स्थित वर्तमान जयपुर , जोधपुर एवं अजमेर , जिसे कभी सम्मिलित रूप से किशनगढ़ के नाम से जाना जाता था , वहीं पर चित्रकला की एक नवीन शैली ‘ बनी – ठनी ‘ ने 1735 ई . से 1757 ई . के बीच जन्म लिया ।  समग्ररूप से इस शैली को किशनगढ़ के नाम से अभिहित किया जाता है ।

भारतीय चित्रकला के इतिहास में इसे एक अनुपम चित्रकला माना गया है । धर्मपाल एवं देवपाल राजाओं के संरक्षण में अजन्ता के अनुकरण पर बंगाल में पाल वंशीय शैली का निर्माण हुआ । उसके प्रमुख चित्रकार धीमान तथा वितपाल थे । इस शैली का उदय 9 वीं शताब्दी में हुआ ।

1924 ई . में डॉ . आनन्दकुमार स्वामी गुजरात शैली को प्रकाश में लाए । इसे गुजरात या गुर्जर शैली कहा जाता है । गुजरात के बाहर तथा गुजरात में जैन और जैनेत्तर ग्रन्थों के अनेकानेक चित्र प्राप्त हुए हैं । इन चित्रों की शैली को राय कृष्णदास ने अपभ्रंश शैली कहा ।

जैन चित्रकला शैली की ऐतिहासिक उपलब्धि 7 वीं शताब्दी से है ।  इसके प्रमाण सित्तनवासल गुफा की वे 5 जैन मूर्तियाँ हैं जो सम्राट हर्ष के समकालीन पल्लव राजा तथा महेन्द्रवर्मन के काल में विनिर्मित हुई ।  इस शैली की प्रमुख विशेषता है कि भारतीय चित्रकला के इतिहास में कागज पर की गई चित्रकारी की दिशा में इसका पहला स्थान है ।

राजपूत शैली का विकास आंशिक रूप से 15 वीं शताब्दी में हुआ ।  इस शैली के विकास में कन्नौज , बुंदेलखंड के चंदेल राजाओं का काफी योगदान रहा है ।  राजपूत शैली की समृद्ध एवं प्रभावशाली शाखा कोटा एवं बूंदी के नाम से प्रसिद्ध है ।

मारवाड़ शैली के अन्तर्गत कलाकारों ने राज्य के प्राकृतिक दृश्यों का पूर्ण उपयोग किया था जिसमें रंगमाला और रसिकप्रिया के विषयों पर निर्मित चित्र अत्यधिक रोमांटिक एवं प्रभावपूर्ण हैं ।

दक्कन शैली के महान संरक्षक अली आदिल शाह एवं उसका उत्तराधिकारी इब्राहिम- II थे । वस्तुतः इस शैली का प्रधान केन्द्र बीजापुर था ।  बीजापुर , गोलकुण्डा एवं अहमदनगर में तैयार की गयी रंगमाला चित्रकारी दक्कनी शैली की श्रेष्ठ रचना है । गढ़वाल चित्र शैली के जनक शामनाथ और हरदास थे । वस्तुतः इस शैली का चरमोत्कर्ष भोलाराम के समय में हुआ ।

1526 ई . में मुगलों के आगमन से भारत में एक नवीन चित्र शैली का आगमन हुआ जिसे फारस के महान चित्रकार वहेजाद ने विकसित किया था । मुगलकाल में हुमायूँ ने फारसी चित्रकला की सर्वप्रथम शुरुआत की थी । यद्यपि रूप चित्रकारी का प्रचलन अकबर के ही शासन काल में प्रारंभ हो गया था किन्तु जहांगीर के शासन काल में यह अपने चरम उत्कर्ष को प्राप्त हुई ।

शाहजहाँ के काल में मुहम्मद प्रमुख चित्रकला मर्मज्ञ था ।

मुगलकाल में मुख्यतः दो प्रकार के चित्र बने

( 1 ) व्यक्ति चित्र

( 2 ) लघु चित्र प्रकृति चित्र एवं फल – पत्ती , पशु – पक्षी , दरबारियों के चित्र पुस्तकों के उदाहरण चित्रों का भी इस युग में निर्माण हुआ ।

मुगलकालीन चित्रों में दो प्रकार की चित्र शैलियों का मिश्रण है :

( 1 ) भारतीय

( 2 ) ईरानी फकीर उल्ला

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मुगल साम्राज्य की समाप्ति की अवस्था में कलाकारों का अन्य क्षेत्रों में पलायन होने लगा । इस पलायन के क्रम में भारतीय चित्रकला के विभिन्न क्षेत्रीय रूप भी विकसित एवं उन्नत हुये । इन्हीं चित्रकला में से एक ‘ पटना कलम ‘ या ‘ पटना शैली ‘ प्रमुख है ।

इस शैली पर मुगलशाही शैली , ब्रिटिश शैली तथा स्थानीय विशेषताओं का भी प्रभाव पड़ा । इस विद्या के प्रमुख कलाकारों में सेवक राम ( 1770- 1830 ) , हुलास लाल ( 1785 1885 ) , जयराम दास , शिवदयाल लाल , ईश्वरी प्रसाद आदि का नाम उल्लेखनीय रहा ।

मकबूल फिदाहुसैन की चित्रकृतियाँ

> आँखों पर पट्टी बाँधे गांधारी हाथी और चक्रव्यूह में फंसा अभिमन्यु घोड़ा

> अश्वत्थामा आदमी आधुनिक चित्रकला की विभिन्न चित्र शैलियों के रूपनाम और सम्बद्ध चित्रकार

> ताजमहल और शाहजहाँ की मौत औरंगजेब का बुढ़ापा

> बुद्ध और सुजाता पद्मपत्र में अश्रुबिन्दु

» भारत माता – शाहजहाँ का ताज को देखना

» तिष्यरक्षिता स्वतंत्रता का स्वप्न

> रवीन्द्रनाथ का महाप्रयाण

> कृष्ण लीला

 

मधुबनी चित्रकला

मिथिला एवं मधुबनी चित्रकला में धार्मिक एवं लोकप्रिय ग्रामीण लोक कथाओं की अभिव्यक्ति पायी जाती है । यह एक लोककला है जिसमें महिलाओं की ही लगभग पूर्ण भूमिका होती हैं । यह चित्र दो प्रकार के होते हैं- भित्ति चित्र और अरिप्पन ।

बिहार के मधुबनी जिले का जितवारपुर नामक ग्राम मिथिला लोक कला के लिये विश्व प्रसिद्ध है । मिथिला चित्रकला की सर्वप्रमुख कलाकार पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त 80 वर्षीया सीता देवी हैं , जिन्होंने 1986 में बर्लिन में भारत महोत्सव में भाग लिया था ।

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जादोपटिया चित्रकला की लोक शैली है जो संथाल समाज के मिथक पर आधारित है । इन चित्रों की रचना करने वाले को संथाली भाषा में ‘ जादो ‘ कहते हैं । इसमें चित्र छोटे कपड़ों या कागज के टुकड़ों को जोड़कर बने पटों पर अंकित किये जाते हैं ।

थंका चित्रकला मूलतः तिब्बती चित्रशैली है , लेकिन कुछ लोग इन्हें बिहार की चित्रशैली मानते हैं । ,

बिहार के भागलपुर क्षेत्र में लोककथाओं में प्रचलित बिहुला – विषहरी की कथाएँ मंजूषा चित्रशैली में चित्रित होती हैं ।  इस शैली में स्त्री – पुरुषों के चेहरों का सिर्फ बायां पक्ष ही निम्रित होता है । राजा रविवर्मा चित्रकला के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं ।

चित्रकारों के राजकुमार तथा ‘ राजकुमारों में चित्रकार ‘ की संज्ञा से सुविख्यात् राजा रविवर्मा का जन्म 29 अप्रैल , 1848 को केरल के तिरुअनन्तपुरम् से 40 किमी . दूर स्थित ‘ किनीमत्तूर ‘ के राजघराने में हुआ था । उसने लाल , सुनहरे , ताम्बई तथा पीत रंगों का प्रचुर प्रयोग किया ।

नल – दमयंती , मानिनी राधा , हंस – दमयंती , सरस्वती , शकुन्तला , हरिश्चन्द्र , भीष्म प्रतिज्ञा आदि उनकी प्रमुख चित्र विधियाँ हैं ।

बंगाल चित्र कला शैली

बंगाल चित्र कला शैली का अग्रदूत अवनींद्रनाथ ठाकुर थे इन्होने भारतीय चित्रकला में महत्वपूर्ण योगदान दिया  ।  अवनींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 1871 ई . में ठाकुर ( टैगोर ) परिवार में हुआ । इनके द्वारा बनाया गया प्रसिद्ध चित्र शाहजहाँ का ताज को देखना , रेखा एवं रंगों में , कलाकार के मन की गहराइयों में छिपे भावों की अभिव्यक्ति है ।

 

 

प्रमुख चित्रकार एवं उसके द्वारा बनाया गया चित्र

चित्रकारचित्र
उस्ताद मंसूरबाज
लियोनार्डो द विंसीमोनालिसा
माइकल एंजिलोद फॉल ऑफ मैन
रफेलमाँ मेडोना
विशनदास शबीहशेष फूल
रविन्द्र नाथ टैगोरनारी
रविन्द्र नाथ टैगोरभारतमाता
गगनेन्द्र नाथ ठाकुरकल्कि अवतार
नंदलाल बसुउड़ीसा की एक दुकान
असित कुमार हल्दरसहअस्तित्व
लियोनार्दो द विंसीदलास्ट सपर
माइल एंजिलोद लास्ट जजमेंट
राजारवि वर्माशकुंतला वियोग
मकबूल फिदा हुसैनढोलकिया माजाज
 फ्रांसिस्को गोयाऑन बालकोनी

 

 

 

 

 

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