मानसून की जानकारी

चर्चा में क्यों है ?

भीषण गर्मी के बाद अब हर किसी की निगाहें आसमान पर टिकी हुई है. कहीं बादलों के बरसने के इंतजार में तो कहीं इस उम्मीद में की बादल बरसना बंद हो और बाढ़ का खतरा टले । इन दिनों देश के ज्यादातर हिस्सों में दक्षिण पश्चिम मानसून का असर देखा जा रहा है | कई जगहों पर तो खूब बारिश हो रही है  | मगर कहीं कहीं आधा जुलाई बीत जाने के बाद भी मानसून रूठा हुआ सा लग रहा है |

लगातार हो रही बारिश से आश्रम और बिहार में बाढ़ से हालात बदतर हो गए हैं तो दूसरी तरफ कुछ जगह ऐसी भी है जहां लोग एक बूंद पानी को भी तरस रहे हैं भारतीय मौसम विभाग ने एल नीनो का असर कम पढ़ने और देश में अच्छी बारिश होने की उम्मीद जताई है |

जबकि ( यूएस वेदर नेशनल सर्विस क्लाइमेट प्रिडिक्शन सेंटर ) के मुताबिक Madden Julian oscillation के स्थिति और तीव्रता के कारण भारतीय मानसून का विकास प्रभावित हुआ है इस वजह से भारत में मानसून के आगमन और विस्तार में देरी हो रही है |

 मानसून और उसकी क्रियाविधि

मानसून मुख्य रूप से हिंद महासागर और अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर आने वाली उन पवनों को कहा जाता है  जो भारत पाकिस्तान बांग्लादेश इत्यादि देशों में भारी बारिश कराती है. यह ऐसी मौसमी पवने होती है जो दक्षिणी एशिया क्षेत्र में जून से सितंबर तक सक्रिय रहती है. इस अवधि को वर्षा ऋतु काल यानी बारिश का मौसम कहा जाता है |

मानसून के उत्पत्ति के संदर्भ में सिद्धांत

जब उत्तर पश्चिम भारत में अप्रैल-मई में भीषण गर्मी पड़ती है तो वहां कम दबाव का क्षेत्र बनता है. जून की शुरुआत में यह निम्न वायुदाब की दशाएं इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वह हिंद महासागर से आने वाली दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवने को आकर्षित कर देती है .इन दशाओं में अंत उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तर की ओर चला जाता है |

अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र ( intertropical convergence zone ) ITCZ  विश्वत वृत्त पर स्थित एक निम्न वायुदाब वाला क्षेत्र है | इस क्षेत्र में व्यापारिक पवने मिलती है | निम्न दाब के कारण इस क्षेत्र में पवने ऊपर की ओर उठने लगती है. जुलाई के महीने में आईटीसीजेड( ITCZ ) 20 डिग्री से 25 डिग्री अक्षांश के आसपास गंगा के मैदान में स्थित हो जाता है इसे ही मानसूनी गर्त कहते हैं. यह मानसूनी गर्त उत्तर और उत्तर पश्चिमी भारत पर तापीय निम्न दाब के विकास को प्रोत्साहित करता है |

ITCZ को उत्तर की ओर खिसकने के कारण दक्षिणी गोलार्ध की ट्रेड विंस कोरिओलिस बल के प्रभाव से विषुवत वृत्त को पार कर जाता है. और यह दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर बहने लगती है | गर्म महासागर से ऊपर से गुजरने के कारण यह पवने अपने साथ पर्याप्त मात्रा में नमी लाती है| ‘इन पवनों की दिशा दक्षिण पश्चिम होने के कारण ही इसे दक्षिण पश्चिम मानसून कहा जाता है  | जब यह पवने स्थल पर पहुंचती है ,तो उच्चावच (भू आकृति ) और उत्तर पश्चिम भारत पर स्थित तापीय निम्न वायुदाब इनकी दिशाओं को बदल देते हैं |

यह मानसूनी पवने भारत में प्रवेश करने से पहले दो हिस्सों में बट जाती है और भूखंड पर मानसून दो शाखाओं में पहुंचता है |

  1.   अरब सागर की शाखा

  2.   बंगाल की खाड़ी की शाखा ‘

इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में  प्रवेश करता है

बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर उड़ीसा ,पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश ,हरियाणा और पंजाब में वर्षा करता है | अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली पवने  आंध्र प्रदेश ,कर्नाटक, महाराष्ट्र ,मध्य प्रदेश और राजस्थान में बरसती है|

आमतौर पर भारत में मानसून का प्रवेश 1 जून का होता है . सबसे पहले या केरल के तट पर दस्तक देता है प्रचंड गर्जन और बिजली की कड़क के साथ इन आद्रता भरी पवनों का अचानक चलना मानसून का प्रस्फोट कहलाता है|  ‘

वायुमंडल में जब विपरीत परिस्थितियां निर्मित होती है तो मानसून के रुख में बदलाव होता है . और वह कम या ज्यादा बारिश के रूप में सामने आता है मौसम मापक यंत्र के गणना के मुताबिक

  • 90 फ़ीसदी से कम बारिश होती है. तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है |
  •  96 से 104 फ़ीसदी वर्षा को सामान्य मानसून कहा जाता है
  •  104 से 110 फ़ीसदी हो तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है

भारतीय मानसून पर (एल नीनो) El Niño और( इएनएसओ ) ENSO  का असर |

मानसून पर (एल नीनो) और ( ला निना ) का काफी गहरा असर पड़ता है , एल नीनो एक महासागरीय परिघटना है जो हर 5 ,6 साल के बाद आती है हालांकि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से यह आजकल दो-तीन सालों में आने लगी है| एल नीनो की घटना में पूर्वी प्रशांत महासागर के जल स्तह असामान्य रूप से गर्म हो जाती है ।

पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरु  के तट के पास गर्म जल समुद्री धारा की मौजूदगी होना ही एल नीनो कहलाता है यह  धारा पेरू तट के जल का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देती है | प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के जल सतह के तापमान अलग – अलग हो जाने से वहां बहने वाली व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर विरल वायुदाब क्षेत्र की ओर बढ़ जाती है |

इस क्रम में यह हवाए गर्म जल को पश्चिम की ओर यानी इंडोनेशिया की ओर धकेल देती है .जिसे एल नीनो का विस्तार होता है  | इसके अलावा एल नीनो मध्य प्रशांत महासागर और ऑस्ट्रेलिया के वायु दाब बदलाव से भी गहरी तौर पर जुड़ी हुई है | प्रशांत महासागर पर वायुदाब में बदलाव दक्षिणी दोलन कहलाता है |

प्रशांत महासागर से लेकर हिंद महासागर के भारतीय आस्ट्रेलियाई क्षेत्र के वायुदाब में होने वाला बदलाव ही दक्षिणी दोलन को जन्म देता है. जब प्रशांत महासागर में उच्च दाब की स्थिति होती है. तब अब फिर पेरू से  ऑस्ट्रेलिया तक हिंद महासागर के दक्षिणी हिस्से में निम्न दाब की स्थिति पाई जाती है | दक्षिणी दोलन एवं एल नीनो की संयुक्त घटना को एल नीनो El nino southin oscillation ( ENSO ) के नाम से जाना जाता है|  जिन साल इनसो ताकतवर होता है |

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दुनिया भर में मौसम पैटर्न में काफी भिन्नता ए देखने को मिलती है उस साल आमतौर पर सुखा रहने वाले दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर भारी बारिश होती है. जबकि ऑस्ट्रेलिया और भारत में सूखा पड़ता है| इस कारण भारत में बारिश कराने वाला दक्षिण पश्चिम मानसून कमजोर हो जाता है इस तरह से इस  दौरान मौसम पैटर्न उलट जाता है |

एल नीनो की तरह ही ( ला नीना )  भि मानसून का रुख तय करने वाली सामुद्रिक घटना है| यह आमतौर पर एलनीनो के बाद होती है | जहां एल नीनो में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है वही ला नीना में समुद्री सतह का तापमान बेहद कम हो जाता है | ला नीना की स्थिति एल नीनो से बिल्कुल विपरीत होती है |

भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक

मानसून अच्छा होगा या खराब यह कई सारे वायुमंडलीय और महासागरीय पर घटनाओं पर निर्भर करता है | इनमें एक महत्वपूर्ण कारण है एल नीनो और ला नीना |

एल नीनो में भारत में मानसून कमजोर रहता है वही ला नीना वर्षों में मानसून मजबूत होता है ऐसे ही हिंद महासागर Indian ocean dipole भी मानसून को प्रभावित करता है |

Indian ocean dipole के दौरान हिंद महासागर का पश्चिमी भाग  की अपेक्षा ज्यादा गर्म या ज्यादा ठंडा होता रहता है|  पश्चिमी हिंद महासागर के गर्म होने पर भारतीय मानसून पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है | जबकि ठंडा होने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है | Madden Julian oscillation ( MJO ) की वजह से मानसून की प्रबलता और अवधि दोनों प्रभावित होती है |

( MJO ) Madden Julian oscillation निरंतर प्रवाहित होने वाली समुद्री परिघटना है | यह हवा बादल दबाव की एक चलती हुई प्रणाली है यह जैसे ही भूमध्य रेखा के चारों ओर घूमती है वर्षा की शुरुआत हो जाती है. जब यह मानसून के दौरान हिंद महासागर के ऊपर होती है तो पूरे उपमहाद्वीप में अच्छी बारिश होती है |

जब यह लंबे चक्र के समय अवधि के रूप में होती है और प्रशांत महासागर के ऊपर रहती है. तब भारतीय मानसूनी मौसम में कम बारिश होती है.  ( MJO ) के चलते महासागरीय बेसीनो , उष्णकटिबंधीय चक्रवातओं की संख्या और तीव्रता भी प्रभावित होती है | जिसके परिणाम स्वरूप जेट स्ट्रीम में भी परिवर्तन आता है |

( MJO ) मानसून  में एल नीनो और ला निना की तीव्रता और गति के विकास में भी योगदान देता है | इसी तरह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवात भी मानसून को प्रभावित करते हैं |

चक्रवातओ के केंद्र में अति निम्न दाब की स्थिति पाई जाती है. जिसकी वजह से इसके आसपास के अपने अत्यंत तीव्र गति से इसके केंद्र की ओर बहती है | जब इस तरह की परिस्थितियां सतह के नजदीक बनती है .तो मानसून को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है|  इनमें भी अरब सागर में बनने वाले चक्रवात बंगाल की खाड़ी के चक्रवातो  के मुकाबले ज्यादा असरदार होते हैं, क्योंकि भारतीय मानसून का प्रायद्वीपीय क्षेत्र में प्रवेश अरब सागर की ओर से होता है | इसके अलावा जेटस्ट्रीम भी मानसून को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है |

वर्षा के वितरण और मानसून की अनियमितता

भारत में औसत वार्षिक वर्षा तकरीबन 125 सेंटीमीटर है .लेकिन इसमें क्षेत्रीय विभिनता है देखने को मिलती है | मानसूनी बारिश काफी अनिश्चित किस्म की होती है|  कभी बारिश होने से बाढ़ की हालात बन जाते हैं | तो कभी बेहद कम बारिश होने से सूखे की संकट खड़ा हो जाता है |

मानसून के आने और इसके लौटने में भी अनियमितता पाई जाती है कभी तो यह समय से पहले आ जाता है तो कभी काफी देर से , मानसून से होने वाली बारिश में भी प्रादेशिक विषमता देखने को मिलती है | उत्तर पूर्वी राज्य मेघालय के मासिनराम में लगभग 1200 सेंटीमीटर वर्षा होती है. ‘जबकि राजस्थान के जैसलमेर में में 12 सेंटीमीटर के आसपास वर्षा होती है .

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                                           दुनिया की नक्शा

मानसून विच्छेदन और मानसून वापसी की प्रक्रिया

दक्षिण मानसून काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद अगर एक दो या कई सप्ताह तक वर्षा नहीं हो तो इसे मानसून विच्छेदन कहा जाता है | यह विच्छेदन कई वजह से होता है |

उत्तरी भारत के विशाल मैदान में मानसून का विच्छेदन ,उष्णकटिबंधीय चक्रवातओं की संख्या कम हो जाने से और ITCZ की स्थिति में बदलाव आने से होता है |

पश्चिमी तट पर मानसून विच्छेद तब होता है जब आद्र पवने तट के समांतर बहने लगते हैं. ऐसे ही राजस्थान में मानसून विच्छेदन तब होता है. जब वायुमंडल के निम्न स्तरों पर तापमान के विलोमता वर्षा करने वाली नम हवाओं को ऊपर उठने से रोक देती है |

अक्टूबर और नवंबर के महीने को मानसून को लौटने की घटनाएं होती है | मानसून को पीछे हटने या लौट जाने को मॉनसून का निर्वतन कहां जाता है  | शीत ऋतु में सितंबर के अंत में सूर्य के दक्षिणायन होने की स्थिति में गंगा के मैदान पर स्थित निम्न वायुदाब का क्षेत्र ITCZ भी दक्षिण की ओर खिसक जाता है | इससे दक्षिण पश्चिम मानसून कमजोर पड़ने लगता है. सितंबर के पहले सप्ताह में मानसून राजस्थान ,गुजरात, पश्चिम गंगा मैदान से लौट जाता है सितंबर के आखिर तक उत्तर पश्चिमी भारत से मानसून पीछे हटे लगता है |

ITCZ के खिसकने से पवनों की दिशा दक्षिण पश्चिम से बदलकर उत्तर पूर्व हो जाता है यही उत्तर पूर्व मानसून होता है |

लौटती हुई पवने बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण करके उत्तर पूर्वी मानसून के रूप में तमिल नाडु ,दक्षिण आंध्र प्रदेश, दक्षिण पूर्वी कर्नाटक और दक्षिण पूर्वी केरल के तट पर बारिश करती है |

भारत के लिए मानसून का महत्व

भारत में मानसून की महत्व जीवन रेखा के समान है. भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और देश में होने वाली ज्यादातर कृषि मानसून पर निर्भर होती है | जिस साल मानसून अच्छा रहता है तो यहां अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी के लिए सुख का संदेश लेकर आता है |

देश के आधे से ज्यादा आबादी का हिस्सा खेती ,किसानी में लगा हुआ है और देश का जीडीपी ( GDP ) का तकरीबन 16.1 फ़ीसदी हिस्सा कृषि से ही आता है लेकिन देश के कुल कृषि भूमि के बड़े हिस्से पर नियमित सिंचाई की सहूलियत मौजूद नहीं है |

यह बड़ा हिस्सा कृषि के लिए मानसून पर निर्भर है इसीलिए अच्छे मानसून को अच्छी फसल से जोड़ा जाता है मानसूनी वर्षा अच्छी होने से नदियों झील ,जलाशयों, तालाबों में पानी भर जाता है  | जिससे ना केवल भूजल स्तर ठीक होता है, जबकि जल चक्र का नियमन भी होता ह

इस रूप में वर्षा का यह जल साल भर जलापूर्ति का स्रोत बना रहता है और देश को सूखे के संकट से निजात मिलती हैं |  जल विद्युत और योजनाओं से बिजली का अपेक्षित उत्पादन भी मानसून पर निर्भर है अगर मानसून अच्छा हो तभी बिजली का उत्पादन ज्यादा होता है |

मानसून का असर महंगाई से लेकर आम आदमी की थाली तक पड़ता है

निष्कर्ष

मानसून भारतीय जनजीवन की धुरी है पर हम अब तक मानसून का फायदा लेने और प्रबंधन करना नहीं सीख सके हैं. यही वजह है कि हमारे यहां पर्याप्त बारिश होने के बाद भी जल संग्रहण की कमी दिखती है और भीषण गर्मी में हमें जल संकट का सामना करना पड़ता है |

बारिश के हर बूंद को सहेज कर हम जल संकट से निपट सकते हैं .इसके लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य किए जाने के साथ डैम जैसे जल संग्रहण उपायो कि क्षमता बढाने की जरूरत है |

देश के कुछ इलाकों में बारिश से हर साल बाढ़ की स्थिति पैदा होती है जिसका प्रबंधन करना बड़ी चुनौती है | इसके लिए आपदा प्रबंधन के व्यवस्थाओं को और ज्यादा मजबूत करने की दरकार है|  इसके अलावा मानसून की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए ज्यादा अपग्रेड मैकेनिज्म की जरूरत है | ताकि उसके हिसाब से ही सरकार और बाकी कंपनियां मानसून की तैयारी कर सकें |

तेजी से हो रहा जलवायु परिवर्तन से मानसून पर असर पड़ रहा है | इसलिए हमें जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाले कारकों जैसे जीवाश्म ईंधन का दहन, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन आदि पर नियंत्रण करने की जरूरत है ।

 

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