शहीद दिवस क्यों मनाया जाता है ?भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव का बलिदान

शहीद दिवस क्यों मनाया जाता है ? भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव का बलिदान .

आज के इस आर्टिकल में जानेगे शहीद दिवस क्यों मनाया जाता है ? भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव का बलिदान ने कैसे अंग्रेजो उखार फेका एवं भारत में एक क्रांति का जन्म दिया | जिसने अंग्रेजो को भारत छोरने पर मजबूर कर दिया |

अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने की जज्बा लिए क्रांतिकारियों ने अपने अदम्य साहस और बलिदान से ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव ऐसे ही महान क्रांतिकारी थे | जिन्होंने देश के लिए न सिर्फ कुर्बानियां दी बल्कि अपने विचारों और शोध से सोच से क्रांतिकारी दर्शन को आगे बढ़ाया |

इन तीनों क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया .23 मार्च 1931 को भारत के इन तीन वीर नौजवानों को एक साथ फांसी दे दी गई | पूरा देश उन वीर शहीदों की याद में शहीद दिवस मनाता है. अपने बलिदान से भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने साम्राज्य विरोधी संघर्ष को पैनी धार और गति देने का काम किया |

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च की घटना सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है इस दिन साल 1931 में हमारे वीर सपूतों भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया |

दरअसल आजादी की लड़ाई में देशभक्तों का काफी बलिदान रहा इन क्रांतिकारियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना देश को आजाद कराने के लिए अपने अंतिम सांस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे और जब जरूरत हुई तो हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले भारतीय सबसे पहले भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु का नाम आता है |

आजादी की लड़ाई में खुद को देश के लिए शहीद यह नायक हमारे लिए आदर्श है, यह तीनों वीर सपूत क्रांतिकारी धारा के अनुयाई थे तभी तो फांसी के फंदे पर चढ़ने से कुछ वक्त पहले तक भगत सिंह एक पुस्तक पढ़ रहे थे|  सुखदेव कुछ गीत गुनगुना रहे थे और राजगुरु वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे |

जीवन की मस्ती इन्हें डीएवी कॉलेज लाहौर में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के स्नातक जय चंद्र विद्या अलंकार के विचारों से प्राप्त हुई थी | यह तीनों देशभक्त नौजवान भारत सभा और हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिक आर्मी के अनोखे वीर थे  |तीनों की मित्रता इसलिए मजबूत थी क्योंकि उनकी विचारधारा और सोच एक ही थी और वह थी देश के आजादी ,

जब साइमन कमीशन 1927 में भारत आया तब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने जमकर विरोध किया था | इसी दौरान अंग्रेजो के खिलाफ एक प्रदर्शन में पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया |

इसके बाद भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु और उनके साथियों ने लाला जी का मौत का बदला लेने के लिए योजना बनाई, इसके बाद भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु ने दिसंबर 1928 में अंग्रेज सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स को गोली मार दी |

,भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु समेत अनेक क्रांतिकारी मानते थे की पराधीनता की बेरिया अहिंसा की नीतियों से नहीं काटी जा सकती,

यही वजह थी की जब ब्रिटिश सरकार ने लोगों की पर अत्याचार करने की मकसद से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बील को पारित कराने की कोशिश की | तब भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने उसके विरोध में 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली के अंदर बम फेंका बम फेंकने के बाद भी दोनों पर्चे बांटते रहे | उन पर्चे पर अपना मकसद भारत माता की पूर्ण आजादी लिखा हुआ था

दरअसल भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का मकसद किसी की हत्या करना नहीं था बल्कि अंग्रेजों की नीति के खिलाफ देश में जागृति लाना था|  बम फेंकने के बाद दोनों ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया  | इस घटना के बाद अंग्रेजों ने बड़े स्तर पर क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी की राजगुरु सुखदेव को भी गिरफ्तार कर लिया गया सब अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार किए गए |

लेकिन पुलिस ने सांडर्स की मौत से कड़िया जोड़कर भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुना दी , पूरे देश में इसका विरोध होने के बावजूद 23 मार्च 1931 को इन तीनों वीर सपूतों को लाहौर के जेल में फांसी दे दी गई,

    भगत सिंह की जीवनी

 

शहीद दिवस क्यों मनाया जाता है भगत सिंह
भगत सिंह की जीवनी

भगत सिंह का जन्म  28 सितंबर 1907 को लालपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था | हालांकि उनका पैतृक गांव पंजाब के खटकरकलां में है | भगत सिंह का पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता  विद्यावती था वह अपने मां-बाप की तीसरी संतान थे |

भगत सिंह का परिवार स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ था | उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह गडर पार्टी के सदस्य थे जब भगत सिंह का जन्म हुआ तब उनके पिता और चाचा दोनों जेल में थे |

इन्हीं दिनों 13 अप्रैल 1919 को जब अमृतसर में जब जालियांवाला बाग हत्याकांड हुआ तब भगत सिंह मात्र 12 वर्ष के थे | लेकिन इस घटना ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला| इस अमानवीय घटना को देखने के बाद वह किसी भी कीमत पर भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए सोचने लगे |

जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू किया, तब भगत सिंह अपनी पढ़ाई छोड़ कर आंदोलन में शामिल हो गए | जब 1922 में चौरी चौरा घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन समाप्त कर दिया ,तब भगत सिंह बहुत दुखी हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि अहिंसा से देश को आजादी नहीं मिल सकती और इसके लिए ही सशक्त क्रांति ही एकमात्र सही मार्ग है  |

असहयोग आंदोलन समाप्त होने के बाद भगत सिंह ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना जारी रखा. अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखने के लिए उन्होंने नौजवान भारत सभा नाम से एक क्रांतिकारी संगठन बनाया  वे कुछ दिनों तक कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में रहे

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1928 में उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया  | इसका मुख्य उद्देश्य स्वस्थ क्रांति के जरिए भारत में गणतंत्र का स्थापना करना था | इस बीच फरवरी 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया तब पूरे देश में उसका विरोध किया गया  |

साइमन कमीशन के खिलाफ नारेबाजी करते समय लाला लाजपत राय पर पुलिस लाठी चार्ज किया गया  | जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई  | भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मौत के बदला लेने के लिए ब्रिटिश अधिकारी एस्कॉर्ट को मारने की शपथ लिया लेकिन गलती से सहायक अधीक्षक सांडर्स को एस्कॉर्ट समझकर मार दिया |

ब्रिटिश सरकार भारतीयों के अधिकारों को कुचलने के लिए लगातार दमनकारी नीतियों का इस्तेमाल कर रहे थे | 1929 में ब्रिटिश सरकार ऐसी ही एक मजदूर विरोधी दमनकारी नीति पारित कराने चाहत थी .

इस बिल को ना पारित होने देने की मकसद से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका बम फेंकने का मकसद किसी को मारना या चोट पहुंचाना नहीं था, बल्कि अंग्रेजों को जनता की समस्याओं पर ध्यान दिलाना था और यह दिखाना था कि उनके दमन के तरीकों को और अधिक सहन नहीं किया जा सकता है  |

23 मार्च 1931 को भगत सिंह और सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया गया | भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक विचारक चिंतक लेखक और पत्रकार भी थे | अनेक भाषाओं के जानकार भगत सिंह भारत में समाजवाद के पहले व्याख्याता थे उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा व संपादन किया |

भगत सिंह का  मानना था कि 

जब तक अमीर गरीब का खाई खत्म नहीं होगी, मनुष्य के द्वारा मनुष्य की की जाने वाली लूट बंद नहीं होगी और सामाजिक समानता नहीं आएगी तब तक आजादी का संकल्प अधूरा माना जाएगा

अमर शहीद भगत सिंह भले ही अपने आंखों से आजाद भारत को नहीं देख सके लेकिन उनका बलिदान इतिहास की धरोहर बन गया | हम आज भी जब इंकलाब का नारा सुनते हैं तब भगत सिंह हमारे दिन दिमाग पर छा जाते हैं |

राजगुरु की जीवनी 

राजगुरु की जीवनी 
राजगुरु

23 मार्च को अमर शहीद भगत सिंह के शहीदी दिवस के रूप में याद किया जाता है लेकिन इसी दिन उनके साथ दो साथी सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी दे दी गई  |

भगत सिंह और सुखदेव का नाम तब तक अधूरा है जब तक उनके साथ राजगुरु का नाम ना लिया जाए वतन के लिए हंसते-हंसते जान लुटाने वाले शहीद थे | राजगुरु जो आजादी के सपना दिल में लिए फांसी के फंदे पर झूल गए |

भगत सिंह का दोस्त और क्रांतिकारी राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरी राजगुरु था उनका जन्म 24 अगस्त 1960 को पुणे के पास खेड़ गांव में हुआ था | मराठा ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले राजगुरु का पिता का नाम हरिनारायण और माता का नाम पार्वती बाई था |

राजगुरु मात्र 6 साल के थे तभी उनके सिर से पिता का साया छिन गया पिता के निधन के बाद राजगुरु पढ़ाई के लिए बनारस आ गए जहां उनकी मुलाकात कई क्रांतिकारियों से हुई  | पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजों के अत्याचार और जुल्म को देखकर राजगुरु का मन उनके खिलाफ नफरत से भर गया और वह देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का सपना देखने लगे|

तीर कमान, निशानेबाजी और कुश्ती में निपुण राजगुरु महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद से काफी प्रभावित थे और वह इसी के नाते सिर्फ 16 साल की आयु में क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी जो से जुड़ गए | राजगुरु और उनके साथियों का मकसद था ब्रिटिश सरकार और अधिकारियों के मन में खौफ पैदा करना |

इसके लिए वह घूम घूम कर लोगों को जागरूक करते और जंग आजादी के लिए तैयार करते थे अनेक क्रांतिकारियों की तरह ही राजगुरु का मानना था आजादी हथियारों के बल पर ही हासिल की जा सकती है | इसीलिए उनके कई विचार महात्मा गांधी के विचारों से मेल नहीं खाते थे राजगुरु को उनके साथियों के बीच रघुनाथ छद्म नाम से भी जाना जाता था  |

क्रांतिकारी गतिविधियों में घीरते हुए राजगुरु की मुलाकात भगत सिंह और सुखदेव से हुई और तीनों परम मित्र बन गए | राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर दिसंबर 1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या में शामिल थे |

सुखदेव की जीवनी

सुखदेव की जीवनी 
सुखदेव

15 मई 1907 को लुधियाना में जन्मे सुखदेव को भी भगत सिंह और राजगुरु के साथ फांसी दे दी गई थी | सुखदेव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लायलपुर के सनातन धर्म के हाई स्कूल में हुई  |

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग के हत्याकांड के बाद पंजाब में मार्शल लॉ लगाकर फौज और पुलिस तैनात कर दी गई | भारतीय लोगों और बच्चे को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए स्कूलों में अंग्रेज अफसरों द्वारा सलामी लेने का सिलसिला शुरू किया गया |

सुखदेव के स्कूल में भी सरकारी आदेशों के अनुसार सभी विद्यार्थियों को हर सुबह अंग्रेज अफसरों को सलामी देने के लिए कहा गया, लेकिन 12 वर्ष के सुखदेव ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया |

इसके वजह से उन्हें अध्यापकों और पुलिस अफसर की मार खानी पड़ी|  सुखदेव ने देश प्रेम और राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करते हुए मार खाते रहे परंतु उन्हें झुकना मंजूनाथा | आखिर जितने दिन तक स्कूल में सलामी का सिलसिला चलता रहा इतने दिन तक सुखदेव स्कूल नहीं गए ।

उस समय छुआछूत के चलन होने के कारण उनके स्कूल में भी दलित छात्रों का दाखिला नहीं दिया जाता था | इस बात का जब उन्हें पता चला तब उनका बाल मन दुखी हुआ  | 15- 16 वर्ष के सुखदेव पास के गांव हरचरणसिंहपुरा में दलित बच्चों को पढ़ाने लगे  | यह सिलसिला उनके लाहौर जाने तक चलता रहा|

मैट्रिक पास करके लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया .यहां पर सुखदेव की भेंट भगत सिंह से हुई दोनों का लक्ष्य देश को अंग्रेजी राज से मुक्ति दिलाने था| मंजिल भी एक थी रास्ता भी एक था इसलिए दोस्ती भी गहरी होती चली गई | इसी कॉलेज की लाइब्रेरी में सुखदेव और भगत सिंह को बहुत सा क्रांतिकारी साहित्य पढ़ने को मिला |

बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन के सदस्य बने सुखदेव ने भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया | इस सभा का मुख्य काम नौजवानों को आजादी की लड़ाई के लिए एकजुट करना था |

1928 में साइमन कमीशन के विरोध करते हुए लाला लाजपत राय पर पुलिस ने लाठियां बरसाई इसमें लालाजी बुरी तरह घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई बाद में भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव तीनों को एक साथ फांसी की सजा सुनाई गई |तीनों क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए और देश के युवाओं के मन में आजादी पाने की नई ललक पैदा कर गए |

 

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