शीतयुद्ध का दौर

शीतयुद्ध का दौर ( Cold War 1945-90 )

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के काल में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को शीतयुद्ध का दौर कहा  जाता है । कुछ इतिहासकारों द्वारा इसे ‘ शस्त्र सज्जित शान्ति ‘ का नाम भी दिया गया है ।

रूस के नेतृत्व में साम्यवादी और अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी देश दो खेमों में बँट गये । बर्लिन संकट , कोरिया युद्ध , सोवियत रूस द्वारा आणविक परीक्षण , सैनिक संगठन , हिन्द चीन की समस्या , यू -2 विमान काण्ड , क्यूबा मिसाइल संकट कुछ ऐसी परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने शीतयुद्ध ) की अग्नि को प्रज्वलित किया और सन् 1991 में सोवियत रूस के विघटन के साथ शीतयुद्ध की समाप्ति हो गयी ।

के.पी.एस. मैनन के अनुसार – शीत युद्ध दो विरोधी विचारधाराओं – पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ( Capitalism and Communism ) , दो व्यवस्थाओं – बुर्जुआ लोकतत्र तथा सर्वहारा तानाशाही ( Bourgeoise Democracy and Proletarian Dictatorship ) , दो गुटों – नाटो और वार्सा समझौता , दो राज्यों – अमेरिका और सोवियत संघ तथा दो नेताओं – जॉन फॉस्टर इल्लास तथा स्टालिन के बीच युद्ध था जिसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा ।

 

शीतयुद्ध का दौर की उत्पत्ति ( Rise of Cold War )

पूंजीवादी ( अमेरिका ) और साम्यवादी ( सोवियत संघ ) विचारधारा का प्रसार एवं मतभेद होने लगा ।

सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना भी शीत युद्ध के उत्पत्ति का एक कारण था |

ईरान में सोवियत हस्तक्षेप , टर्की में सोवियत हस्तक्षेप , यूनान में साम्यवादी प्रसार के वजह से अमेरिका इनसे मतभेद करने लगा |

तुष्टिकरण की नीति

सोवियत संघ द्वारा बाल्कन समझौते की उपेक्षा कर दी गई |

अमेरिका और रसिया का परमाणु कार्यक्रम होने से यह दोनों देश आपस में ही विरोधी बन गए |

लैंड – लीज समझौते का समापन |

फासीवादी ताकतों को अमेरिकी सहयोग मिलने लगा जबकि साम्यवादी ताकतों को रसिया सहयोग करता था |

बर्लिन विवाद |

सोवियत संघ द्वारा बिटो पावर का बार – बार प्रयोग किया जाना |

 

शीतयुद्ध का दौर
शीतयुद्ध का दौर

शीत युद्ध का प्रथम चरण ( 1946 से 1953 )

1946 में चर्चिल ( ब्रिटेन ) एवं अमेरिकन सीनेट द्वारा सोवियत संघ के साम्यवाद की आलोचना करने लगा  ।

टूमैन सिद्धान्त ( मार्च 1947 ) : साम्यवादी प्रसार को रोकने पर बल दिया गया और आर्थिक सहायता के नाम पर यूनान और  टर्की में अमेरिका द्वारा हस्तक्षेप को उचित ठहराया गया ।

अमेरिका की मार्शल योजना ( 23 अप्रैल 1947 ) : साम्यवादियों को दूर रखने की शर्त पर पश्चिमी यूरोपीय देशों को 12 अरब डालर की आर्थिक सहायता देने का कार्यक्रम स्वीकार किया ।

सोवियत संघ द्वारा बर्लिन की नाकेबंदी 1948 : अमेरिकी विरोध , जर्मनी का बंटवारा स्वार्थपूर्ण करके जर्मनी को दो भागो में पूर्बी जर्मनी और पच्छिमी जर्मनी में बाट दिया गया | जिसपर एक योर अमेरिका और रूस अपने कब्जे में ले रखा था |

नाटो 1949 : अमेरिका द्वारा अपने मित्र राष्ट्रों के सहयोग से नाटो सैनिक संघ का निर्माण किया ।

चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना ( 1 अक्टूबर 1949 ) : अमेरिका द्वारा विरोध होने लगा |

कोरिया संकट 1950 : उत्तरी कोरिया को सोवियत संघ तथा दक्षिणी कोरियों को अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी राष्ट्रों का समर्थन व सहयोग प्राप्त था ,

अमेरिका – जापान प्रतिरक्षा संधि 1951 : कोरिया युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने मित्र राष्ट्रों के साथ मिलकर जापान से शान्ति सन्धि की ( सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन )

 

 शीत युद्ध का द्वित्तीय चरण ( 1953 से 1963 ) ।

सोवियत संघ का प्रथम आणविक ( परमाणु ) परीक्षण 1953 : अमेरिका को भय सताने लगा

– सीटो ( SEATO ) 8 सितम्बर 1954 : 1953 में चर्चिल के सुझाव पर अमेरिका द्वारा कम्बोडिया , वियतनाम और लाओस में साम्यवादी प्रसार रोकने के उद्देश्य से सीटो ( SEATO ) गठन किया गया |

वार्सा पैक्ट : जिसमे पूजीवादी ताकतों के आक्रमणों को रोकने के लिए वार्सा पैक्ट को लागु किया गया |

– हिन्द – चीन गृहयुद्ध 1954 : यह क्षेत्र फ्रांस का उपनिवेश था । सोवियत संघ ने होचिन मिन की सेनाओं की मदद की और अमेरिका ने फ्रांसीसी सेनाओं का समर्थन किया । हिन्द – चीन की समस्या को सुलझाने के लिए जेनेवा समझौता हुआ लेकिन कुछ समय बाद ही वियतनाम में गृह युद्ध शुरू हो गया ।

-वियतनाम समस्या : सोवियत संघ ने अमेरिका के वियतनाम में हस्तक्षेप का विरोध किया

-हंगरी समस्या 1956 : सोवियत संघ का हस्तक्षेप

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– स्वेज नहर संकट 1956 : सोवियत संघ ने इस संकट में मिस्र का साथ दिया ।

-आईजनहावर सिद्धान्त जून 1957 : अमेरिका की कांग्रेस ने राष्ट्रपति को साम्यवाद के खतरों का सामना करने के लिए सशस्त्र सेनाओं का प्रयोग करने का अधिकार प्रदान किया ।

यू -2 समस्या : अमेरिकी राष्ट्रपति आइजन हॉवर ने सोवियत संघ की यात्रा करने का निर्णय किया । लेकिन यात्रा से एक दिन पूर्व ही 1 मई 1960 को अमेरिका का जासूसी विमान यू -2 सोवियत सीमा में जासूसी करते हुए पकड़ा गया ।

– पेरिस सम्मेलन 16 मई 1960 : सोवियत राष्ट्रपति खुश्चेव ने यू -2 की घटना को दोहराया और भविष्य में अमेरिकी राष्ट्रपति को सोवियत संघ न आने की चेतावनी थी ।

– बर्लिन की दीवार अगस्त 1961 : बर्लिन शहर में सोवियत संघ ने पश्चिमी शक्तियों के क्षेत्र को अलग करने के लिए दीवार बनानी शुरू कर दी । अमेरिका ने कड़ा विरोध किया ।

क्यूबा संकट 1962 : क्यूबा में सोवियत संघ ने अपने सैनिक अड्डे की स्थापना कर दी । इसका 23 अमेरिका के राष्ट्रपति कनैडी ने कड़ा विरोध किया ।

– सकारात्मक पहल : खुस्चेव की अमेरिका यात्रा – 15 सितम्बर से 28 सितम्बर 1959 तक । 5 सितम्बर 1963 को अमेरिका , सोवियत संघ और ब्रिटेन के बीच ‘ मास्को आंशिक परीक्षण निषेध सन्धि ‘ ( Moscow Partial Test Ban Treaty ) हुई ।

 

शीत युद्ध का तृत्तीय चरण ( 1963 से 1979 तक ) –

– 1962 में क्यूबा संकट के बाद शीत युद्ध के वातावरण में कुछ नरमी आई ।

– दोनों गुटों के मध्य व्याप्त तनाव की भावना सौहार्दपूर्ण व मित्रता की भावना में बदलने के आसार दिखाई देने लग गए ।

– इस शैथिल्य से शीतयुद्ध से उत्पन्न पुराने अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों का परिदृश्य बदलने लगा और विश्व में शांतिपूर्ण वातावरण का जन्म हुआ ।

– संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका में भी वृद्धि हुई और परमाणु युद्ध के आतंक से छुटकारा मिला ।

– भारत – पाक युद्ध 1971 : भारत को सोवियत संघ का एवं पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन , तृतीय विश्व युद्ध की आशंका

 

नव शीतयुद्ध – 1980 से 1989 तक

– रीगन ने राष्ट्रपति बनते ही शस्त्र उद्योग को बढ़ावा दिया और मित्र राष्ट्रों का शस्त्रीकरण करने पर बल दिया ।

– अमेरिका तथा सोवियत संघ में अन्तरिक्ष अनुसंधान की होड़ लग गई ।

– अफगानिस्तान संकट : सोवियत संघ का हस्तक्षेप , सोवियत संघ ने दक्षिण पूर्वी एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया ।

– स्टार वार्स परियोजना ( अन्तरिक्ष युद्ध ) : 23 मार्च 1983 को अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन की मंजूरी ।

– हिंद महासागर में सोवियत संघ ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी ।

– सोवियत संघ ने खाड़ी क्षेत्र तथा पश्चिमी एशिया में भी अपना प्रभुत्व बढ़ाने का प्रयास किया ।

– सोवियत संघ ने क्यूबा में अपनी ब्रिगेड तैनात कर दी ।

– निकारागुआ में अमेरिका ने अपना प्रभुत्व बढ़ाना शुरू कर दिया ।

 

अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर शीतयुद्ध का दौर का प्रभाव

– विश्व का दो गुटों – सोवियत गुट तथा अमेरिकन गुट , में विभाजन हो गया ।

– विश्व में आतंक और भय में वृद्धि हुई । इससे अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों में तनाव और प्रतिस्पर्धा बढ़ी ।

– परमाणु युद्ध की सम्भावना बढ़ी और परमाणु शस्त्रों के विनाश के बारे में सोचा जाने लगा ।

– नाटो , सीटो , सेण्टो तथा वारसा पैक्ट जैसे सैनिक संगठनों का जन्म हुआ , निशस्त्रीकरण विफल ।

– संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका में कमी कर दी । विश्वशान्ति के लिए भयंकर खतरा उत्पन्न हो गया ।

– इसने सुरक्षा परिषद को पंगु बना दिया । अपनी वीटो शक्ति का दोनों ने बार बार प्रयोग किया ।

– तीसरी दुनिया में विकास की उपेक्षा हुई । इसने शक्ति संतुलन के स्थान पर ‘ आतंक के संतुलन ‘ को जन्म दिया ।

– इसने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को सबल आधार प्रदान किया ।

– विश्व में नव उपनिवेशवाद का जन्म हुआ ।

– विश्व राजनीति में परोक्ष युद्धों की भरमार हो गई । इससे राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलनों का विकास हुआ ।

 

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