शी जिनपिंग एवं भारत चाइना व्यापारिक संबंध

शी जिनपिंग ने चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के सामान्य कार्डर से सत्ता के शिखर तक का सफर तय किया हैं । शी जिनपिंग का जन्म 15 जून 1953 को हुआ था | उनके पिता कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे | शी जिनपिंग का संबंध एक जाने-माने परिवार से है    .लेकिन उनके लिए सब कुछ इतना आसान नहीं था | 1962 में सांस्कृतिक क्रांति से पहले पार्टी विरोधी गतिविधियां के आरोप में उनके पिता को पद से हटाकर जेल में डाल दिया गया |

एक दशक लंबी संस्कृतिक क्रांति के तहत सरकार शिक्षा और मीडिया में पूंजीवादी प्रभावों और बुर्जुआ सोच को खत्म करने की मांग की गई | बहुत से पार्टी नेताओं को काम करने खेतों और कारखानों में भेज दिया गया | 15 साल की उम्र में शी जिनपिंग को फिर से शिक्षित होने के लिए देहाती इलाकों में भेजा गया  | एक गांव में उन्होंने 7 साल तक कड़ी मेहनत की और किसानों के बीच रहे इस अनुभव ने उनकी राजनीतिक सोच को आकार दिया ।

शी जिनपिंग ने 1975 में सिंघवा यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया . कम्युनिस्ट पार्टी में कई बार पार्टी में शामिल होने की कोशिश की लेकिन उनके पिता की वजह से खारिज किया गया |

1974 में वह समय आया जो पार्टी ने उनके लिए दरवाजे खुले . सबसे पहले वह हुबई प्रांत में पार्टी की स्थानीय सचिव बने, कड़ी मेहनत के बदौलत उन्हें बाद में शंघाई का मुखिया बनाया गया  | 1979 में शि जिनपिंग को सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के सेक्रेटरी जनरल का सचिव नियुक्त किया गया था | चीन में इस कमीशन को काफी ताकतवर माना जाता है |

चीनी सेना पर इस कमीशन का खास नियंत्रण है .1982 में सी जिनपिंग को वावडिंग  भेजा गया.  बीजिंग से कुछ समय की दूरी पर  बस्सी इस काउंटी में उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के डिप्टी सेक्रेटरी का पद सौंपा गया  | शी जिनपिंग ने 1987 में पेंग लियुआन से शादी की, 1980 से लेकर 1990 तक शी जिनपिंग को पार्टी से सरकार और सरकार से सेना में कई प्रकार की जिम्मेदारियां मिलती रही | उन्होंने ज्यादातर पूर्वी तटीय इलाकों में कार्यभार संभाला जो कि ताइवान से सटे इलाके हैं | एक के बाद एक सीढ़ियां चढ़ते हुए शी जिनपिंग फोजियान प्रांत के गवर्नर बनाए गए इसके बाद वह चीन आर्थिक राजधानी शंघाई में सबसे ताकतवर अधिकारी बनाए गए |

अब तक वह राष्ट्रीय पटल पर सामने आ चुके थे. शी जिनपिंग को 2007 में कम्युनिस्ट पार्टी का पावर सेंटर माने जाने वाले पोलेड ब्यूरो में जगह मिली ‘ यहां पर जगह पाने के बाद उन्हें चीन के पूर्व राष्ट्रपति हु जिंताओ का उत्तराधिकारी माने जाने लगा था |

2012 में शी जिनपिंग को पार्टी जनरल सेक्रेटरी और सैन्य आयोग का चेयरमैन बनाया गया इसके बाद मार्च 2013 में शी जिनपिंग ने चीन के राष्ट्रपति का पद संभाला और सरकार की उन सभी आयोग की कमान संभाल ली जिनका सेना पर नियंत्रण था |

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने 18 अक्टूबर 2017 को 19 वी नेशनल कांग्रेस में शी जिनपिंग को कोर लीडर ऑफ चाइना का टाइटल दिया

2018 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने अपने संविधान में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की अधिकतम दो कार्यकाल की सीमा समाप्त कर दी | चीन की संसद ने 11 मार्च 2018 को दो कार्यकाल की अनिवार्यता को दो तिहाई बहुमत से खत्म कर दिया | इस संविधानिक बदलाव के साथ ही शी जिनपिंग का आजीवन चीनी राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ हो गया है | इस समय उनका दूसरा कार्यकाल चल रहा है जो 2023 में खत्म होगा |

सत्ता में आने के बाद शी जिनपिंग ने जनता से यह वादा किया कि वह लोगों को साफ सुथरी सरकार देंगे|  वह छोटे बड़े भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाएंगे और उन्होंने इस वादे पर अमल भी किया | वह अकसर गांव के लोगों से मिलने जाते रहे हैं वह खुद को कम्युनिस्ट पार्टी के रईस और भ्रष्ट नेताओं से अलग रह कर पेश करते हैं |

साल 1978 में जब चीनी नेता डेंग शियाओपिंग ने आर्थिक सुधारों को चीन में शुरू किया तब दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन का हिस्सा महज 1.8 फ़ीसदी था | लेकिन कुशल नेतृत्व में आर्थिक विकास ने रफ्तार पकड़ी और आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में से एक है | चीन को ताकतवर बनाने में जिन तीन नेताओं का नाम लिया जाता है उनमें माँतसेतुगं ‘ डेंग स्योपिंग ‘ और चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल है |

शी जिनपिंग नवंबर 2012 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष चुने गए  | इसके बाद मार्च 2013 में वह चीन के राष्ट्रपति बने राष्ट्रपति बनने के बाद से शी जिनपिंग की चीन की सत्ता पर पकड़ लगातार मजबूत होती चली गई और उन्होंने चीन के विकास के लिए हर मोर्चे पर काम करना शुरू कर दिया |

उन्होंने चीन के विकास के लिए उन्होंने टु- बर्ड- थ्योरी दी ‘ इसके तहत सबसे पहले उन्होंने औद्योगिक विकास पर जोर दिया | साल 2014 में 12वीं नेशनल कांग्रेस को संबोधित करते हुए जिनपिंग ने कहा था, पिंजरे को खोलने की जरूरत है और उसमें बुड्ढे पक्षियों यानी आखरी सांस ले रहे  औद्योगिक संस्थान को कैद करने की जरूरत है |

शी जिनपिंग ने कहा था की इसी प्रक्रिया के तहत चीन निर्वान तक पहुंच सकेगा |  इस निर्वाण की प्रक्रिया में शी जिनपिंग का जोर मौलिक तकनीक और पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ विकास पर रहा | नई नीतियों के तहत शी जिनपिंग ने सरकारी उद्योग पर शिकंजा कसा उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण से सरकारी कंपनियों को दूर किया और पूरी तरह से प्रबंधन के हाथों में यह जिम्मेवारी दे दी |

शी जिनपिंग के कार्यकाल में एनजीओ पर भी शिकंजा कसा गया दरअसल चीन ने उदारीकरण के लिए पूरा खाका तैयार किया था | चीन के नेताओं ने केंद्रीय नियंत्रण वाले नेतृत्व पर जोर दिया ,लेकिन स्थानीय सरकार और निजी कंपनियों और विदेशी निवेशकों के बीच काफी अच्छा सामंजस्य भी बढ़ाया |

विदेशी निवेशकों को चीन ने स्वायत्तता दि पहले के नेताओं की तुलना में शी जिनपिंग ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर ज्यादा जोर दिया आज चीन दुनिया के लिए मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया है | शी जिनपिंग ने चीन में विदेशी निवेश और व्यापार बढ़ाने के लिए कई सारे सुधार की है इसका परिणाम यह हुआ चीन में लाखों लोग गरीबी रेखा से ऊपर आने में कामयाब हुए |

शी जिनपिंग के नीतियों का ही परिणाम था कि 2014 के बाद से चीन में निजी निवेश बहुत तेजी से बड़ा सी जिनपिंग ने व्यापार का दायरा पूरी दुनिया में बढ़ाया|  वन- बेल्ट- वन- रोड परियोजना के जरिए इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेड नेटवर्क को एशिया ,यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने के महत्वकांक्षी परियोजना भी इसमें शामिल है |

आज चीन के आर्थिक विकास और समृद्धि से पूरी दुनिया हैरान है. दरअसल शी जिनपिंग ने चीन की अर्थव्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए मैन्युफैक्चरिंग के मामले में उसे सुपर पावर बनाना चाहते हैं | इसके लिए शी जिनपिंग डेंस शॉपिंग के नीतियों को ही आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें अर्थव्यवस्था को खोलना और आर्थिक सुधार जैसे कदम शामिल है |

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सी जिनपिंग जैसे-जैसे चीन की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते गए वैसे वैसे उनका राजनीतिक कद बढ़ता गया  | बीते साल अक्टूबर में जब कम्युनिस्ट पार्टी का अधिवेशन हुआ था, तो उसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विचारधारा को संविधान में शामिल करते हुए उन्हें चीन के पहले कम्युनिस्ट नेता और संस्थापक मौततुवांग का बराबर का दर्जा दिया गया | यह एक तरह से उनके कार्य और विचार की स्वीकृति ही है |

भारत और चाइना संबंध

2014 में जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो पूरा देश उनमें भारत के लिए कई संभावनाएं देख रहा था | वही मार्च 2013 में शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति बन चुके थे और एक नई दिशा देने की कोशिश में लगे हुए थे | नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों को लेकर भी लोगों को काफी उम्मीद थी |

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में काफी प्रयास किए इसके तहत सितंबर 2014 को चीन के राष्ट्रपति, पीएम मोदी के निमंत्रण पर अहमदाबाद पहुंचे | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस मुलाकात के दौरान कैलाश मानसरोवर यात्रा के नए रूट और रेलवे ने सहयोग समेत 12 समझौते पर हस्ताक्षर किए गए |

इसके अलावा दोनों देशों ने क्षेत्रीय मुद्दों और चीन के औद्योगिक पार्क से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए . हालांकि उसी दौरान चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी करीब 1000 जवान पहाड़ी से जम्मू कश्मीर के सुमार इलाकों में घुस आए थे |लेकिन भारत ने अपनी तरफ से वार्ता में कोई खलल नहीं पड़ने दिया |

संबंधों में मजबूती आने के साथ-साथ दोनों देशों में कुछ मुद्दे पर तनाव भी होते रहे हैं  | जून 2017 में डोकलाम पर सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव शुरू हो गया | करीब 2 महीने तक दोनों देशों के बीच काफी तनातनी होने के बाद आखिरकार विवाद समाप्त हुआ|  हालांकि इस विवाद के बाद भी दोनों देश के नेताओं ने कई यादगार मुलाकाते की जिनमें आधिकारिक और अनौपचारिक मुलाकाते शामिल है |

इस दौरान दोनों नेताओं ने आपसी मतभेद को भुलाकर आतंकवाद से लड़ने पर्यावरण संरक्षण और आपसी व्यापार बढ़ाने के साथ ही सीमा विवाद और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की |

साल 2014 के बाद मई 2015 में भी दोनों नेताओं ने मुलाकात की थी जिसमें सीमा विवाद को जल्द सुलझाने के साथ ही व्यापारिक रिश्ते को मजबूत करने पर जोर दिया गया था|  वहीं साल 2016 में हांगझू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति ने मुलाकात की थी ,जिसमें भारत ने पीओके  ( POK ) में संचालित आतंकवाद का मुद्दा उठाया था|

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यही नहीं सितंबर 2017 में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में फिर से सी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मुलाकात हुई | दोनों देशों के संबंधों के बीच नया आयाम देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पहला अनौपचारिक शिखर सम्मेलन बुहान में आयोजित किया गया |इस मुलाकात के दौरान द्विपक्षीय और वैश्विक महत्व के मुद्दे पर बातचीत| हुई  इस दौरान शी जिनपिंग पीएम मोदी को हुबई मैं म्यूजियम ले गये । जहां चीनी कलाकारों ने भारत के प्रधानमंत्री के स्वागत में सांस्कृतिक कार्यक्रम किये ।

इसी साल 2019 में चीनी राष्ट्रपति से द्विपक्षीय वार्ताएं हुई. जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किर्गिस्तान में आयोजित दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन में भाग लेने के लिए गए हुए थे | दोनों देशों के नेताओं ने आपसी सहयोग और मुलाकात से संबंधों को एक नया आयाम दिया है , इसी वजह से ना केवल दोनों देशों को आपसी व्यापार में बढ़ोतरी हुई है बल्कि सहयोग के नई कई रास्ते खुले हैं, हालांकि कभी-कभी सीमा विवाद अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर मतभेद होते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सूझबूझ से मामले सुलझते भी रहे हैं |

भारत और चीन के बीच व्यापारिक और राजनीतिक संबंध प्राचीन काल से ही रहे हैं | 2000 साल पहले बौद्ध धर्म और दर्शन चीन में भारत से आया आज भी चीन में बौद्ध धर्म का प्रभाव है|  चीन के लोगों ने प्राचीन काल से ही बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भारत के नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय को चुना था  |

प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु व्हेन सांग जैसे यात्री समय-समय पर भारत आकर बौद्ध पांडुलिपिया और संस्कृत में लिखे ग्रंथ लेकर चीन लौटे | वह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था. वह भारत में 15 वर्षों तक रहा |

आजादी के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर उभरा बलकि चीन ने समाजवाद की राह पकड़ी | 1949 में नए चीन के स्थापना के बाद 1950 में भारत ने चीन के साथ राज नायक संबंध स्थापित किए, उसके बाद भारत और चीन के रिश्ते कभी एक जैसे नहीं रहे |

हालांकि 1962 के युद्ध और 1967 के सीमित संघर्ष के अलावा दोनों देश हिंसा से बचते रहे हैं  | 1986 में दोनों देशों की सेनाओं आमने सामने आई लेकिन कोई संघर्ष नहीं हुआ | तब से दोनों देश सीमा विवाद बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश करते रहे हैं  | इस बीच दोनों देशों के सालाना व्यापार बढ़कर 9500 करोड़ से ज्यादा हो गया है | हालांकि सीमा विवाद के अलावा तिब्बत और दलाई लामा जैसे मुद्दे हैं जिन पर दोनों देशों के बीच टकराव है |

दुनिया की कुल आबादी में भारत और चीन के हिस्सेदारी 37 फ़ीसदी से ज्यादा है दोनों देशों का कुल क्षेत्रफल करीब 13000000 वर्ग किलोमीटर का है जो एशिया की कुल जमीन का तकरीबन 30 फ़ीसदी है भारत-चीन रिश्तो में पिछले कुछ सालों में सुधार आया है भारत चीन निर्मित सामानों का बड़ा आयातक है हालांकि चीन के साथ 57.6 अरब डॉलर का व्यापारिक घटा भारत के लिए चिंता का सबब है |

2017 में यह घाटा 51.72 अरब डॉलर था| इसके अलावा और भी कई मुद्दे हैं जिन को लेकर भारत को फिक्र जायज है |आतंकवाद परमाणु ऊर्जा तक पहुंच और कनेक्टिविटी जैसे मामलों पर दोनों देशों में मतभेद है | चीनी सैनिक के सीमा पर गतिविधियां उत्तर-पूर्व के राज्यों पर चीन का दावा और नत्थी वीजा जैसे कई सवाल हैं जिनका हल दोनों देशों का तलाश करना होगा |

आजादी के बाद भारत ने पड़ोसी मुल्कों के साथ अच्छे रिश्ते पर जोर दिया | चीन के साथ 1954 में पंचशील सिद्धांतों पर सहमति बनी लेकिन पंचशील सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए चीन ने 1962 में भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी | हालांकि उसके बाद के दौर में दोनों देशों के बीच व्यापार और सामाजिक सहयोग बढ़ा है अब भारत चीन व्यापार संबंध एक नए युग में प्रवेश कर रहा है  | यह व्यापारिक और आर्थिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है |

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