बिहार की राजनीति ( Politics of Bihar )

बिहार की राजनीति का पूरा इतिहास

सभ्यता ज्ञान और संस्कृति के केंद्र बिहार ने अपने समृद्ध बिहार की राजनीति, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा से दुनिया का मार्गदर्शन किया, वैशाली को विश्व में गणतंत्र का जन्म स्थली माना जाता है| समय-समय पर सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के जरिए देश को दिशा दिखाने वाला बिहार पहला राज्य है जहां पर कोरोनावायरस के दौर पर विधानसभा चुनाव होने जा रहा है|

मौजूदा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले 15 साल के शासन को चुनौती देने के लिए तेजस्वी यादव की अगुवाई में विपक्ष का महागठबंधन मैदान में है|  वहीं कुछ नया गठबंधन भी अपने-अपने किस्मत आजमा रहे हैं रामविलास के बेटे चिराग पासवान पर भी इन चुनावों में सबकी निगाहे है  |

सत्ता के साथ सियासत के अनेक उतार-चढ़ाव देखने वाले बिहार ने कभी कांग्रेस का छत्र राज देखा है तो वही केंद्र में कांग्रेस की जड़ हिला देने वाली जे पी आंदोलन का आक्रोश भी देखा है | बिहार की राजनीति शुरू से ही जितनी पेचीदा रही उतनी ही दिलचस्पी भी ,

बिहार की सत्ता पर कांग्रेस पार्टी ने लंबे समय तक राज किया लेकिन वक्त बदलने के साथ-साथ यहां की राजनीति में भी उतार-चढ़ाव आता गया, धीरे धीरे प्रदेश की सत्ता पर कांग्रेस की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई 1952 से लेकर 2015 तक बिहार में 16 बार हुए विधानसभा चुनाव में कुल 23 मुख्यमंत्री बने जिनमें से 16 कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे |

आजाद भारत में बिहार में पहली बार चुनाव 1952 में हुआ इस चुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद डॉक्टर श्री कृष्ण सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए |

1957 में दूसरी बार बिहार में विधानसभा चुनाव हुई इस चुनाव में विधानसभा की निर्वाचित सदस्यों की संख्या 330 से घटकर 318 हुई और एक बार फिर कांग्रेस ने सरकार बनाई और फिर से मुख्यमंत्री बने डॉक्टर श्री कृष्ण सिंह इस बार कांग्रेस की टक्कर दी पहली बार चुनाव लड़ रहे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने |

डॉ श्रीकृष्ण सिंह के मृत्यु के बाद कांग्रेस ने दीप नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन वह महश 18 दिन तक ही अपने पद पर रह पाए।

इसके बाद कांग्रेस की ओर से बिहार की सत्ता संभालने का मौका मिला विनोदानंद झा को 1962 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की जीत पर विनोदानंद झा ने एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली इस चुनाव में कुल 9 पार्टियों ने हिस्सा लिया |

जिनमें स्वतंत्र पार्टी जेएस जंक्शन समेत.एचएमएस हिंदू महासभा ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था |

कांग्रेस नेता विनोदानंद झा के करीब ढाई साल मुख्यमंत्री रहने के बाद कांग्रेस ने के बी सहाय को अपना नया मुख्यमंत्री बनाया जो 5 मार्च 1967 तक अपनी सत्ता बनाए रखें |

1968 में बिहार की राजनीति का  समीकरण एक बार फिर ऐसा बना कि कांग्रेस ने सरकार बनाई और सत्ता की कमान मिली भोला पासवान शास्त्री को 22 मार्च 1968 को भोला पासवान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन 3 महीने बाद ही 29 जून 1968 को उनकी सरकार गिर गई  |इस तरह भोला पासवान शास्त्री महश 100 दिन हि सत्ता में रह पाए |

करीब 5 महीने बाद फिर से विधानसभा चुनाव हुए तो फिर कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब रहे|

1969 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने पर हरिहर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन इस बार भी उनकी सरकार नहीं चल सकी और फिर से उनकी सरकार गिर गई एक बार फिर कांग्रेस ने भोला पासवान शास्त्री को अपना मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन 13 दिन के बाद उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा |

1970 में कांग्रेस ने वामपंथी दलों के गठजोड़ से सत्ता बनाने की कोशिश की और इस बार दरोगा प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने लेकिन यह भी कार्यकाल सफल नहीं रहा और उन्हें 1 साल की कार्यकाल पूरा करने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ गया|

इसके बाद कांग्रेस में भोला पासवान शास्त्री के नेतृत्व में 1971 में एक बार फिर सरकार बनाइ भोला पासवान शास्त्री बिहार की तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और इस बार वह 9 जनवरी 1972 तक सत्ता में बरकरार रहे |

1972 के विधानसभा कि चुनाव में कांग्रेस ने 167 सीटें जीतकर फिर से एक बार सत्ता में आई कांग्रेस के नेता केदार पांडे मुख्यमंत्री बने लेकिन उन्हें जुलाई 1973 में अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1973 में अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन लगभग 2 साल के बाद 1975 में ऐसी स्थितियां बनी की उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ गया |

इसके बाद जगन्नाथ मिश्र कांग्रेस की अगला मुख्यमंत्री बने यह दौर आपातकाल का था वह 1975 में मुख्यमंत्री बने और 1977 तक अपने पद पर रहे लेकिन इसके बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस बुरी तरह हार गई, हालांकि बिहार की सत्ता में 3 साल के बाद जून 1980 में एक बार फिर कांग्रेस की वापसी हुई और मुख्यमंत्री बने जगन्नाथ मिश्र लेकिन जगन्नाथ मिश्र ज्यादा दिन तक नहीं टिक सके और उन्हें 3 साल 2 महीने बाद इस्तीफा देना पड़ा, उनकी जगह कांग्रेस ने 1983 को चंद्रशेखर सिंह को मुख्यमंत्री बनाया और उन्होंने करीब 2 साल तक सत्ता की कमान संभाली 1985 में हुई 90 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल की |

कांग्रेस ने अगले 5 साल में चार नए मुख्यमंत्री बदले 1985 में सबसे पहले बिंदेश्वरी दुबे मुख्यमंत्री बने जिन्हें लगभग 3 साल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ गया |

इसके बाद भागवत झा 1988 में मुख्यमंत्री बने लेकिन वह भी करीब 1 साल 1 महीने ही सत्ता में रह सकूं भागवत झा के बाद सत्येंद्रनारायण सिंह ने मार्च 1989 में मुख्यमंत्री बने लेकिन 9 महीने के बाद सितंबर 1989 में अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ गई | वैसे में कांग्रेस ने 6 दिसंबर 1989 को डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा को एक बार फिर सत्ता की कमान सौंपी लेकिन वह भी महज 94 दिन तक ही सत्ता में रह सके |

डॉ जगन्नाथ मिश्र की अगुवाई में 1990 में दसवीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव मैं कॉन्ग्रेस ऐसी हारी की दोबारा आज तक सत्ता में वापसी नहीं कर सकी|

आजादी के बाद से कॉन्ग्रेस बिहार की सत्ता पर लगातार का बीज तो बोती रही लेकिन 1952 में पहली विधानसभा चुनाव से लेकर 1962 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस का प्रदर्शन घटता चला गया और उसे 1967 में हुए चौथे विधानसभा चुनाव में और झटका लगा इस चुनाव में कांग्रेस द्वारा निर्वाचित 318 सीटों में से  128 सीटें ही जीत पाई |

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1967 से लेकर 1972 के बीच बिहार में 9 सरकार बनी जिनका कार्यकाल 4 दिन से लेकर 9 दिन तक का भी रहा |

एक पुरानी कहावत है कि सत्ता और सफलता हमेशा अपना घर बदल लिया करती है बिहार की राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है मंडल दौर के बाद देश के उत्तरी हिस्सों में जिस तरह के राजनीतिक लड़ाई और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई जिसकी गहरी जड़ें बिहार में ही थी |बिहार में कई दशकों तक कांग्रेस का शासन जारी रहा और यह 1990 तक जारी रहा |

आजादी के बाद के बिहार की राजनीतिक पर नजर दौराये तो एसे हमें इसके 3 भिन्न चरणों का पता चलता है

  • पहला चरण 1947 से लेकर 1967 कांग्रेस की शासन काल
  • दूसरा चरण 1967 से 1990 का संक्रमण काल कहा जा सकता है जब पिछली जाति के उभरते हुए प्रभाव को देखा जा सकता है
  • तीसरा चरण 1990 से लेकर अब तक जब सत्ता की चाबी तीसरी जाति के हाथ में रहे

1970 के दशक में बिहार में अति पिछड़ी जातियां राजनीतिक सत्ता के लिए मुखार हो गई

जनता पार्टी की सरकार ने 1978 सिफारिशों को स्वीकार करते हुए लागू कर दिया जिसमें पिछड़ी जाति के पहचान करके सामाजिक न्याय का व्यवहारिक शास्त्र गढ़ा गया, ऐसे में जाति की राजनीति खत्म होने की बजाय संगठित होने लगी केंद्र में जनता पार्टी ने सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए मोरारजी देसाई की अगुवाई में 1979 में मंडल आयोग का गठन किया |

बीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग को लागू करने की कोशिश की मंडल आंदोलन के बाद की स्थिति ने राज्य के राजनीति के दिशा और दशा बदल दे पिछड़ी जाति में नेतृत्व की महत्वकांक्षी काजगना और असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक था |

बिहार की राजनीतिक में जाति आधारित राजनीति का खेल मंडल कमीशन के दौरान लड़े गए चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा सशक्त हुआ|

मंडल की राजनीतिक ने दशकों से सत्ता में काबिज रहने वाली कांग्रेस को हाशिए पर ढकेल दिया 1990 के बाद बिहार की सियासत पूरी तरह से बदल गई मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीतिक में ओबीसी( OBC )समुदाय के लोगों की पकड़ मजबूत होती चली गई |

1990 में लालू प्रसाद यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने सत्ता में लालू प्रसाद के आने के बाद बिहार में एक नई तरह की राजनीति की शुरुआत हुई|  बिहार से शुरू हुई सामाजिक न्याय और मंडल कमंडल की राजनीति का असर पूरे देश में दिखाई दिया |

लालू प्रसाद यादव कि सियासत के मजबूत महल की नीव रखते हि नीतीश कुमार ने अपना ऐसा सियासी किला खड़ा कर लिया जिससे अभी तक कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल पाई है| समय के साथ बिहार में उभरते नए राजनीतिक समीकरणों के साथ विकास की राजनीति के बीच जाति का सामाजिक समीकरण भी बदला |

लालू प्रसाद यादव बिहार के राजनीति का एक ऐसा नाम जिससे प्रदेश का एक तबका गरीबों और पिछड़ों का एक बड़ा नेता मानता है देसी अंदाज और राजनीतिक कुशलता के सहारे लालू प्रसाद यादव के पार्टी आरजेडी बिहार में 1990 से 2005 तक 15 साल सत्ता पर काबिज रहे | लड़ाई संप्रदायिकता के खिलाफ हो या सामाजिक मुद्दा लालू यादव इस दौरान परदेसी नहीं बल्कि देश के राजनीतिक पर भी हावी रहे |

लालू प्रसाद यादव की राजनीति

11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में जन्मे लालू प्रसाद यादव सियासी सफर उतार-चढ़ाव वाला रहा, उनका सियासी सफर 1970 में छात्र राजनीतिक से शुरू हुआ जब वह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के रूप में पहला चुनाव जीते

जयप्रकाश नारायण, राज नारायण ,कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा से प्रेरित होकर लालू प्रसाद यादव ने छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया  |1974 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ बिहार में जोरदार आंदोलन हुए |

लालू यादव ने ही उस वक्त राजनीतिक संन्यास का जीवन बिता रहे समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण को रजामंद कराया कि वह छात्र आंदोलन का मार्ग निर्देश करें |

बिहार में छात्रों के आंदोलन ने जोर पकड़ा और 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू होने के बाद यह देश के अलग-अलग कोनों में फैल गया | आंदोलन का फायदा पहली बार केंद्र में 1970 में गैर कांग्रेसी राज स्थापित हुई उस वक्त लालू प्रसाद यादव 29 साल के थे |

1977 में ही  पहली बार छपरा से जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे लेकिन 1980 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, हालांकि 1980 में ही हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में उन्हें जीत दर्ज करने में कामयाब रहे और 1985 में वे दोबारा विधानसभा चुनाव जीते और कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु के बाद 1989 में बिहार विधान सभा नेता विपक्ष बने 1989 में दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए |

10 साल के भीतर लालू प्रसाद यादव ने बिहार में अपना सिक्का जमा लिया, यह वही दौर था जब मुसलमानों और हिंदुओं के बीच लालू प्रख्यात नेता के रूप में उभरे उस समय ज्यादातर मुसलमान कांग्रेस का समर्थक हुआ करते थे लेकिन लालू ने वह  वोट बैंक तोर दिया|

लालू यादव 1990 से लेकर 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे 1996 में उन्हें चारा घोटाला के मामलों को सामना करना पड़ा जब सीबीआई CBI ने उनकी गिरफ्तारी की तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा उनके हटने पर उनकी पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी.

रावडी देवी ने अगले 8 साल तक बिहार की राजनीति का शासन संभाला जुलाई 1997 में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के नाम से एक नई पार्टी बना ली सन 2000 में हुए विधान सभा चुनाव में एक से 24 सीटें हासिल करके आरजेडी एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी सहयोगी दल के साथ एक बार फिर सरकार का गठन किया राबरी देवी ने एक बार फिर देश की कमान संभाले |

साल 2005 बिहार की राजनीति के लिए अहम वर्ष रहा 15 साल के आरजेडी शासन के बाद बिहार के राजनीतिक ने करवट ली 1 साल में दो बार विधानसभा चुनाव कराए गए बिहार में सुशासन और विकास  राजनीति का मुख्य मुद्दा बना सत्ता की कमान नीतीश कुमार को संभालने को मिला|

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