लीप ईयर किसे कहते है और लीप ईयर कैसे पता करे

आज के इस आर्टिकल में जानेंगे लीप ईयर किसे कहते है एवं  दुनिया भर के कलेण्डरों के बारे में जानेंगे | साथ ही साथ जानने की कोशिश करेंगे विक्रम संवत शक संवत भारत में अनेक पंचांग को और उसके महत्व को. तो आप आर्टिकल को पूरा पढ़े .

लीप ईयर किसे कहते है|Lip year kise kahate hai

दुनिया में एक ऐसा समय था जब लोग बिना तारीखों के सिर्फ अनुमान से अपना जीवन यापन करते थे और जब मौसम बदलने और प्रकृति के हर हरकत पर गौर किया गया और अध्ययन किया गया तो यह सामने आया कि सारी प्रक्रिया एक निश्चित समय में होती है |

पृथ्वी की परिक्रमा को देखकर समस्याएं हल होने लगी धीरे-धीरे कई देशों ने अपने कलैंडर निकाल दिए और पूरी दुनिया में तारीखों का एक जाल बिछ गया जिस देश के लिए जो घटना महत्वपूर्ण थे वह उसी हिसाब से अपना नया वर्ष चुन लिया।

दुनिया में कैलेंडर का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी मानव सभ्यता का है भारत में भी कैलेंडर का इतिहास बहुत प्राचीन समृद्ध और प्रमाणिक है| जिनमें ग्रह नक्षत्र की धरना को आधार बनाकर तिथियों की गणना की गई है इसलिए आज भी भारतीय कैलेंडर एक बड़े तबके के लिए प्रासंगिक है पर आज लगभग सभी देश ग्रेगोरियन कैलेंडर कैलेंडर को मानते हैं |

पर आपने कभी सोचा है कि चौथा साल फरवरी 28 की ना होकर 29 की क्यों होती है इसका मुख्य कारण है कि पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में 365 दिन नहीं लगते बल्कि 365 दिन 6 घंटे लगते हैं यदि इन 6 घंटे को चार बार जोड़ दिया जाए तो 1 दिन बढ़ जाता है जो कि 14 साल इस 13 को जोड़कर 28 फरवरी की जगह 29 फरवरी को महीने लगती है  | इसी को लीप ईयर या अधिवर्ष ( leap year ) कहा जाता है | अपने अच्छी तरह से जाने होंगे : लीप ईयर किसे कहते है |

यदि इस 1 दिन को समय समय पर ना जोड़ा जाए तो हमारे समय की सही-सही गनना नहीं हो पाएगी |

लीप ईयर हम बचपन से इस शब्द को सुनते आए हैं। दरअसल जिस साल फरवरी का महीना 29 तारीख को आता है उसे हम लीप ईयर के नाम से जानते हैं और 4 साल बाद एक लीप ईयर आता है जब फरवरी के महीने में 1 दिन जुड़ जाता है और उस दिन 29 फरवरी को लीप ईयर कहते हैं |

हम और आप अपना जन्मदिन हर साल मनाते हैं लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जिनका जन्मदिन मनाने का मौका सिर्फ 4 साल में एक ही बार मिलता है जी हां हम बात कर रहे हैं 29 फरवरी को पैदा होने वाले शख्स की ऐसा इसलिए होता है क्योंकि 4 साल में एक ही बार फरवरी की महीना 29 दिन का होता है अमूमन फरवरी 28 दिनों की होती है |

आखिर क्यो 4 साल बाद फरवरी में 1 दिन जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी

एक कैलेंडर पृथ्वी की मौसम के अनुरूप होता है कैलेंडर में दिनों की संख्या पृथ्वी की सूर्य की परिक्रमा करने में लगे समय के बराबर होती है पृथ्वी को अपने अक्ष पर घूमने में 24 घंटे लगते हैं वही सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन लगता है असल में पृथ्वी को सूर्य के चक्कर लगाने में 365 दशमलव 2421 9 दिन लगते हैं |

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दीर्घ वृत्ताकार पथ पर 29.72 किलोमीटर प्रति सेकंड की चाल से 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकंड मैं पूरा करती हैं जिसे 365 दिन 6 घंटे मान लिया गया हैं .

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यह 6 घंटे 4 साल में जुड़कर 1 दिन बन जाता है जिसे लीप डे कहते हैं लीप ईयर के जरिए एक अतिरिक्त दिन को कैलेंडर का हिस्सा बनाया जाता है इसीलिए हर चौथे साल फरवरी में 1 दिन जोड़ दिया जाता है फरवरी ही एक ऐसा महीना है जिसमें 28 दिन होते हैं बाकी के महीनों में 30 और 31 दिन होते हैं फरवरी को 1 महीने में सबसे कम दिन होने की वजह से ही इस एक अतिरिक्त दिन को फरवरी में जोड़ दिया जाता है |

कैसे पता किया जाता है कि कोई वर्ष लीप ईयर है या नहीं 

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किसी भी वर्ष को लीप ईयर होने के लिए कुछ शर्तों का पालन करना जरूरी होता है |

पहली शर्त यह है के वह वर्ष जो 4 से पूरी तरह विभाजित हो जाए जैसे 2004, 2008, 2012, 2016, 2020

अगर कोई वर्ष 100 से पूरी तरह विभाजित हो जाए तो वह लीप ईयर नहीं होगा | लेकिन अगर वही 100 से पूरी तरह विभाजित होने वाला वर्ष पूरी तरह 400 की संख्या से विभाजित हो जाता है तो वह लीप ईयर कहलाएगा |

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उदाहरण के लिए 1800 को 100 से तो विभाजित कर सकते हैं लेकिन यह 400 से पूरी तरह विभाजित नहीं होती है इसका मतलब है कि यह लीप ईयर नहीं है|  इसी तरह सन 2004 और 100 से पूरी तरह विभाजित हो जाता है | इसीलिए वह साल लिप इयर ( leap year )कहलाएगा

अगली लीप ईयर ना जोड़ा जाए तो क्या होगा

अब हम इस अतिरिक्त दिन को चौथे साल में नहीं जुड़ेंगे तो हर साल कैलेंडर से 6 घंटे हट जाएंगे और फिर हर 100 साल में कैलेंडर से 24 दिन ही गायब हो जाएंगे हमारी कैलेंडर और धरती की भौगोलिक ऋतुऐ एक दूसरे के साथ तालमेल में बनी रहे इसीलिए ही कैलेंडर मे लीप ईयर जरूरी है |

कैलेंडर के इतिहास के बारे में

दुनिया में एक वक्त ऐसा भी था जब कोई कैलेंडर कैलेंडर नहीं था, लोग अनुभव के आधार पर काम करते थे यह अनुभव प्रकृतिक कार्यों के बारे में था जैसे वर्षा सर्दी ,गर्मी, पतझड़ आदि ही अलग-अलग काम करने के संकेत होते थे |

कैलेंडर के इतिहास के बारे में
                                                                  कैलेंडर

धार्मिक ,सामाजिक उत्साह और खेती के लिए काम भी इन्हीं पर आधारित है| शुरुआती दौर में ही लोगों ने महसूस किया कि मौसम सक्रिय रूप में बदलते हैं और एक मौसम के फिर से आने में उतना ही समय लगता है जितना ही पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर चक्कर करने में समय लगता है | लेकिन सटीक गणना के अभाव में समय का सही आकलन नहीं हो पाता था इसी गन्नना के लिए कैलेंडर या पंचांग का जन्म हुआ |

अलग-अलग देशों ने अपने ढंग से कैलेंडर बनाएं क्योंकि एक ही समय में पृथ्वी के अलग-अलग भागों में दिन रात और मौसमों में बदलाव होता था|

शुरुआत में हर देश ने अपनी सुविधा के हिसाब से कैलेंडर बनाया, साल की शुरुआत कैसे करें इसके लिए किसी महत्वपूर्ण घटना को आधार माना गया  | जैसे कहीं किसी राजा के गद्दी पर बैठने से गिनती शुरू हुई तो कहीं शासकों के नाम से जैसे रोम यूनान, शक आदि बाद में ईसा के जन्म का हजरत मोहम्मद साहब के मक्का छोड़कर जाने की घटना से कैलेंडर बने और प्रचलित हुए |

कैलेंडरो के इतिहास में रोमन कैलेंडर को सबसे प्राचीन माना जाता है जो रोमन राजा न्यू मा पंप्लियस के समय बनाया गया था| इस प्राचीन रोमन कैलेंडर में तीन सौ चार दिन और 10 महीने होते थे हर  साल की शुरुआत मार्च महीने से मानी जाती थी लेकिन आज जो दुनिया भर में कैलेंडर प्रयोग में लाया जाता है उसका आधार रोमन साम्राज्य जुलियस सीजर का ईसा पूर्व पहली शताब्दी मैं बनाया कैलेंडर है|

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जुलियस सीजर ने कैलेंडर को सही बनाने के लिए यूनानी ज्योतिषी सॉसेजेस की सहायता ली थी | जुलियस सीजर ने इस कैलेंडर को 365 दिन और 12 महीने का किया और इस कैलेंडर का नाम पड़ा जूलियन कैलेंडर इसमें जो 2 महीने जुड़ेगा जो जूलियस सीजर के नाम पर जुलाई और अघोष ट्रस्ट के नाम पर अगस्त रखा गया |

इस नए कैलेंडर की शुरुआत जनवरी से मानी गई और इससे ईसा के जन्म से पहले 46 साल पहले लागू किया गया |

दरअसल 46 ईसा पूर्व में यह पहली बार माना गया कि पृथ्वी 365 दिन और 6 घंटे में सूरज का एक चक्कर लगाती है. 365 दिन तो तक तो ठीक था, लेकिन 6 घंटे के बाद एकदम सटीक नहीं पाई गई और उसमें 11 मिनट का अंतर पाया गया इसी 11 मिनट के अंतर को कैलेंडर में सुधारने में करीब 1500 साल का समय लग गया |

तमाम वैज्ञानिकों के शोध कार्य के बाद 1582 में इसे काफी हद तक सुधारा जा सका, दरअसल समय के साथ यह पाया गया की जूलियन कैलेंडर में लीप ईयर सही नहीं है  |

सेंट बीड्स नाम के एक धर्मगुरु ने या बताया की 1 साल में 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट और 45 सेकंड होते हैं इसमें संशोधन करके पोप ग्रेगरी ने 1582 में नया कैलेंडर पेश किया तब से 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत माना गया |

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दोस्तों उम्मीद करता हु की आप इस आर्टिकल में लीप ईयर किसे कहते है और लीप ईयर कैसे पता करे  के बारे में बिस्तार से जाने होंगे अगर आपको आर्टिकल पसंद आया हो तो आप हमें कमेंट जरुर करे |

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